BharatKosha
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

Page 251 of 486

Read in context
Page 251

चौथा पाद **सम्बन्ध—**इसके पूर्व तीसरे पादमें पाँच भूतों तथा अन्तःकरणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन किया गया और गौणरूपसे जीवात्माकी उत्पत्ति भी बतायी गयी। साथ ही प्रसंगवश जीवात्माके स्वरूपका भी विवेचन किया गया। किंतु वहाँ इन्द्रियोंकी और प्राणकी उत्पत्तिका प्रतिपादन नहीं हुआ, इसलिये उनकी उत्पत्तिका विचारपूर्वक प्रतिपादन करनेके लिये तथा तद्विषयक श्रुतियोंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करनेके लिये चौथा पाद आरम्भ किया जाता है। श्रुतिमें कहीं तो प्राण और इन्द्रियोंकी उत्पत्ति स्पष्ट शब्दोंमें परमेश्वरसे बतायी है (मु० उ० २।१।३; प्र० उ० ६।४), कहीं अग्नि, जल और पृथिवीसे उनका उत्पन्न होना बताया गया है (छा० उ० ६। ६।२ से ५) तथा कहीं आकाश आदिके क्रमसे जगत्की उत्पत्तिका वर्णन है, वहाँ इन प्राण और इन्द्रिय आदिका नामतक नहीं आया है (तै० उ० २।१) और कहीं तत्त्वोंकी उत्पत्तिके पहले ही इनका होना माना है (शतपथब्रा० ६।१।१।१) उससे इनकी उत्पत्तिका निषेध प्रतीत होता है। इसलिये श्रुतिवाक्योंमें प्रतीत होनेवाले विरोधका निराकरण करते हुए सूत्रकार कहते हैं— तथा प्राणाः ॥ २।४।१ ॥ तथा = उसी प्रकार; प्राणाः = प्राणशब्दवाच्य इन्द्रियाँ भी (परमेश्वरसे ही उत्पन्न होती हैं)। **व्याख्या—**जिस प्रकार आकाशादि पाँचों तत्त्व तथा अन्य सब परब्रह्म परमेश्वरसे उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार समस्त इन्द्रियाँ भी उसी परमेश्वरसे उत्पन्न होती हैं; क्योंकि उन आकाश आदिकी और इन्द्रियोंकी उत्पत्तिमें किसी प्रकारका भेद नहीं है। श्रुति स्पष्ट कहती है कि 'इस परब्रह्म परमेश्वरसे ही प्राण, मन, समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, ज्योति, जल और सबको धारण