वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २-३ ] अध्याय ३ २८३ निर्मातारं चैके पुत्रादयश्च ॥ ३ । २ । २ ॥ च=तथा; एके=एक शाखावाले; निर्मातारम्=पुरुषको कामनाओंका निर्माता भी मानते हैं; च=और (उनके मतमें); पुत्रादयः=पुत्र आदि ही 'काम' अथवा कामनाके विषय हैं। व्याख्या-कठोपनिषद्में वर्णन आया है कि 'य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः।' (२।२।८) 'यह नाना प्रकारके भोगोंकी रचना करनेवाला पुरुष अन्य सबके सो जानेपर स्वयं जागता रहता है।' इसमें पुरुषको कामनाओंका निर्माता कहा है। क० उ० (१।१।२३-२४)-के अनुसार पुत्र-पौत्र आदि ही काम अथवा कामनाके विषय हैं। इससे भी यही सिद्ध होता है कि स्वप्नमें सृष्टि है। सम्बन्ध-इस प्रकार पूर्वपक्षीके द्वारा स्वप्नकी सृष्टिको सत्य सिद्ध करनेकी चेष्टा की गयी तथा उसे जीवकर्तृक बताया गया। अब सिद्धान्तीकी ओरसे उसका उत्तर दिया जाता है— मायामात्रं तु कार्त्स्न्येनानभिव्यक्तस्वरूपत्वात् ॥ ३ । २ । ३ ॥ तु=किंतु; कार्त्स्न्येन=पूर्णरूपसे; अनभिव्यक्तस्वरूपत्वात्=उसके रूपकी अभिव्यक्ति (उपलब्धि) न होनेके कारण; मायामात्रम्=वह मायामात्र है। व्याख्या-स्वप्नकी सृष्टिका वर्णन करते हुए श्रुतिने यह बात तो पहले ही स्पष्ट कर दी है कि जीवात्मा वहाँ जिन-जिन वस्तुओंकी रचना करता है, वे वास्तवमें नहीं हैं। इसके सिवा, यह देखा भी जाता है कि स्वप्नमें सब वस्तुएँ पूर्णरूपसे देखनेमें नहीं आतीं; जो कुछ देखा जाता है, वह अनियमित और अधूरा ही देखा जाता है। प्रश्नोपनिषद्में तो स्पष्ट ही कहा है कि 'जाग्रत्-अवस्थामें सुनी हुई, देखी हुई और अनुभव की हुई वस्तुओंको स्वप्नमें देखता है, किंतु विचित्र ढंगसे देखता है। देखी-सुनी हुईको और न देखी-सुनी हुईको भी देखता है तथा अनुभव की हुईको और न अनुभव की हुईको भी देखता है।'*
- यह विषय पृष्ठ २२६ सूत्र २।३।३० की टिप्पणीमें आया है।