वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context३० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ बताया गया है। अतः यहाँ 'सत्' नामसे कहा हुआ जगत्का कारण जडतत्त्व नहीं हो सकता। सम्बन्ध— यही बात प्रकारान्तरसे पुनः सिद्ध करते हैं— गतिसामान्यात् ॥ १ । १ । १० ॥ गतिसामान्यात् = सभी उपनिषद्-वाक्योंका प्रवाह समानरूपसे चेतनको ही जगत्का कारण बतानेमें है, इसलिये (जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता)। व्याख्या—'तस्माद् वा एतस्मादात्मनः आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २।१) 'निश्चय ही सर्वत्र प्रसिद्ध इस परमात्मासे आकाश उत्पन्न हुआ।' 'आत्मत एवेदँ सर्वम्' (छा० उ० ७। २६। १)—'परमात्मासे ही यह सब कुछ उत्पन्न हुआ है।' 'आत्मन एष प्राणो जायते' (प्र० उ० ३। ३)— 'परमात्मासे यह प्राण उत्पन्न होता है।' 'एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवी विश्वस्य धारिणी॥' (मु० उ० २।१।३)—'इस परमेश्वरसे प्राण उत्पन्न होता है; तथा मन (अन्तःकरण), समस्त इन्द्रियाँ, आकाश, वायु, तेज, जल और सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करनेवाली पृथिवी—ये सब उत्पन्न होते हैं।' इस प्रकार सभी उपनिषद्-वाक्योंमें समानरूपसे चेतन परमात्माको ही जगत्का कारण बताया गया है; इसलिये जड प्रकृतिको जगत्का कारण नहीं माना जा सकता। सम्बन्ध— पुनः श्रुति-प्रमाणसे इसी बातको दृढ़ करते हुए इस प्रकरणको समाप्त करते हैं— ठीक नहीं है, क्योंकि पहले जीवात्माका सत् (जगत्के कारण)-से संयुक्त होना बताकर उसी सत्को पुनः 'स्व' नामसे कहा गया है और उसीमें जीवात्माके विलीन होनेकी बात कही गयी है। विलीन होनेवाली वस्तुसे लयका अधिष्ठान भिन्न होता है, अतः यहाँ लीन होनेवाली वस्तु जीवात्मा है और जिसमें वह लीन होता है, वह परमात्मा है। इसलिये यहाँ परमात्माको ही 'सत्' के नामसे जगत्का कारण बताया गया है, यही मानना ठीक है।