वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र २६ ] अध्याय ३ ३३७ वहाँ पूर्वोक्त हानि (दुःखनाश आदि) ही वाक्यशेष है। इसलिये प्रत्येक समान विद्यामें उसका अध्याहार कर लेना चाहिये; जिससे किसी प्रकारका विकल्प या फलभेद न रहे। इस प्रकार वाक्यशेष ग्रहण करनेका दृष्टान्त सूत्रकार देते हैं—जैसे कौषीतकि शाखावालोंने सामान्यतः वनस्पतिमात्रकी कुशा लेनेके लिये कहा है। परंतु शाट्यायन शाखावाले उसके स्थानमें गूलरके काठकी बनी हुई कुशा लेनेके लिये कहते हैं; इसलिये उनका वह विशेष वचन कौषीतकिके सामान्य वचनका वाक्यशेष माना जाता है और दोनों शाखावाले उसे स्वीकार करते हैं। इसी तरह एक शाखावाले 'छन्दोभिः स्तुवीत' (देव और असुरोंके) छन्दोंद्वारा स्तुति करे, इस प्रकार समान भावसे कहते हैं। किंतु पैङ्गी शाखावाले 'देवोंके छन्द पहले बोलने चाहिये' इस प्रकार विशेषरूपसे क्रम नियत कर देते हैं, तो उस क्रमको पूर्व कथनका वाक्यशेष मानकर सभी स्वीकार करते हैं। जैसे किसी शाखामें 'षोडशिनः स्तोत्रमुपाकरोति' (षोडशीका स्तवन करे) ऐसा सामान्य वचन मिलता है, परंतु तैत्तिरीय शाखावाले इस कर्मको ऐसे समयमें कर्तव्य बतलाते हैं, जब ब्रह्मवेलामें तारे छिप गये हों और सूर्योदय नहीं हुआ हो। अतः यह कालविशेषका नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समान भावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किंतु दूसरी शाखावाले यह विधान करते हैं कि 'नाध्वर्युंरुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्यशेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोंद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमें जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परंतु पुण्यकर्म तो शेष रहते