वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ३५ ] अध्याय ३ ३४५ व्याख्या—राजा जनककी सभामें याज्ञवल्क्यसे चक्रायणके पुत्र उषस्तने कहा कि 'जो अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझाइये।' तब याज्ञवल्क्यने कहा—'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका है।' उसके पुनः जिज्ञासा करनेपर याज्ञवल्क्यने विस्तारसे समझाया कि 'जो प्राणके द्वारा सबको प्राणक्रियासम्पन्न करता है।' आदि। उसके बाद उषस्तके पुनः पूछनेपर बताया कि 'दृष्टिके द्रष्टाको देखा नहीं जा सकता, श्रुतिके श्रोताको सुना नहीं जा सकता, मतिके मन्ताको मनन नहीं किया जा सकता, विज्ञातिके विज्ञाताको जाना नहीं जा सकता, यह तेरा अन्तरात्मा ही सबका अन्तरात्मा है' (बृह० उ० ३।४।१, २)। फिर कहोल ऋषिने भी वही बात पूछी कि 'जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म है, जो सबका अन्तरात्मा है, उसको मुझे समझावें।' याज्ञवल्क्यने उत्तरमें कहा कि 'जो तेरा अन्तरात्मा है, वही सबका अन्तरात्मा है। जो भूख, प्यास, शोक, मोह, बुढ़ापा और मृत्यु सबसे अतीत है' इत्यादि (बृह० उ० ३।५।१)। इन दोनों प्रकरणोंको दृष्टिमें रखकर इस तरहके सभी प्रकरणोंका एक साथ निर्णय करते हैं। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि 'इसमें जो अन्तरात्मा बतलाया गया है, वह जीवात्मा है या परमात्मा ? यदि परमात्मा है तो किस प्रकार ?' इसका उत्तर देते हुए सूत्रकार कहते हैं—जिस प्रकार भूतसमुदायमें पृथिवीका अन्तरात्मा जल है, जलका तेज है, तेजका वायु है और वायुका भी आकाश है। अतः सबका अन्तरात्मा आकाश है। उसी प्रकार समस्त जड तत्त्वोंका अन्तरात्मा जीवात्मा है और जो अपने-आप का अर्थात् जीवात्माका भी अन्तरात्मा है, वह सबका अन्तरात्मा है; क्योंकि अन्य श्रुतिमें यही बात कही गयी है। अर्थात् उसी प्रकरणके सातवें ब्राह्मणमें उद्दालकके प्रश्नका उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्यने उस परब्रह्म परमात्माको पृथिवी आदि समस्त भूतसमुदायका अन्तर्यामी बतलाते हुए