वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 354 of 486
Read in contextसूत्र ४१ ] अध्याय ३ ३५१ उपस्थितेऽतस्तद्वचनात् ॥ ३ । ३ । ४१ ॥ उपस्थिते = उक्त वचनोंसे किसी प्रकार अन्य चेतनका निषेध प्राप्त होनेपर भी; अतः = इस ब्रह्मकी अपेक्षा अन्य द्रष्टाका निषेध बतानेके कारण (वह कथन आदरार्थक ही है); तद्वचनात् = क्योंकि उन वाक्योंके साथ बार-बार अतः शब्दका प्रयोग किया गया है। व्याख्या—जहाँ उस परमात्मासे अन्य द्रष्टा, श्रोता आदिका निषेध है (बृह० उ० ३।७।२३), वहाँ उस वर्णनमें बार-बार ‘अतः’ शब्दका प्रयोग किया गया है, इसलिये यही सिद्ध होता है कि इसकी अपेक्षा या इससे अधिक कोई द्रष्टा, श्रोता आदि नहीं है। यदि सर्वथा अन्य द्रष्टाका निषेध करना अभीष्ट होता तो ‘अतः’ शब्दकी कोई आवश्यकता नहीं होती। जैसे यह कहा जाय कि इससे अन्य कोई धार्मिक नहीं है तो इस कथनद्वारा अन्य धार्मिकोंसे उसकी श्रेष्ठता बताना ही अभीष्ट है, न कि अन्य सब धार्मिकोंका अभाव बतलाना। उसी प्रकार वहाँ जो यह कहा गया है कि ‘इस परमात्मासे अन्य कोई द्रष्टा आदि नहीं है’ उस कथनका भी यही अर्थ है कि इससे अधिक कोई द्रष्टापन आदि गुणोंसे युक्त पुरुष नहीं है; यह परमात्मा ही सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा आदि है; क्योंकि उसी वर्णनके प्रसंगमें (बृह० उ० ३। ७। २२)* परब्रह्म परमात्माको जीवात्माका अन्तर्यामी और जीवात्माको उसका शरीर बताकर दोनोंके भेदका प्रतिपादन किया है। यदि ‘नान्योऽतो द्रष्टा’ इत्यादि वाक्योंसे अन्य द्रष्टा अर्थात् जीवात्माका निषेध बताना माना जाय तो पूर्व वर्णनसे विरोध आयेगा, इसलिये वहाँ अन्य द्रष्टाके निषेधका तात्पर्य परमात्माको सर्वश्रेष्ठ द्रष्टा बताकर उसके प्रति आदर प्रदर्शित करना ही समझना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँतक यह निर्णय किया गया कि जीवात्मा और परमात्माका
- यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आया है।