वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 356 of 486
Read in contextसूत्र ४३-४४ ] अध्याय ३ ३५३ मुख्य फल नहीं है। परमात्माके साक्षात्कारमें तो ये भोग विलम्ब करनेवाले विघ्न हैं, अतः साधकको इन भोगोंकी भी उपेक्षा ही करनी चाहिये। इसलिये जिनके मनमें भोग भोगनेका संकल्प नहीं है, उनके लिये जन्म-मरणके बन्धनसे छूटकर तत्काल परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाना ही उसका मुख्य फल बताया गया है। (बृह० उ० ४।४।६^१ तथा क० उ० २।३।१४^२)। सम्बन्ध—'यदि ब्रह्मलोकके भोगकी भी उस परब्रह्म परमेश्वरके साक्षात्कारमें विलम्ब करनेवाले हैं, तब श्रुतिने ऐसे फलोंका वर्णन किसलिये किया?' इस जिज्ञासापर कहते हैं— प्रदानवदेव तदुक्तम्॥ ३।३।४३॥ तदुक्तम् = वह कथन; प्रदानवत् = वरदानकी भाँति; एव = ही हैं। व्याख्या—जिस प्रकार भगवान् या कोई शक्तिशाली महापुरुष किसी श्रद्धालु व्यक्तिको उसकी श्रद्धा और रुचि बढ़ानेके लिये वरदान दे दिया करते हैं, उसी प्रकार स्वर्गके भोगोंसे आसक्ति रखनेवाले सकामकर्मी श्रद्धालु मनुष्योंकी ब्रह्मविद्यामें श्रद्धा बढ़ाकर उसमें उन्हें प्रवृत्त करनेके लिये एवं कर्मोंके फलरूप स्वर्गीय भोगोंकी तुच्छता दिखलानेके लिये भी श्रुतिका वह कथन है। सम्बन्ध—उक्त सिद्धान्तको पुष्ट करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— लिंगभूयस्त्वात्तद्धि बलीयस्तदपि॥ ३।३।४४॥ लिंगभूयस्त्वात् = जन्म-मरणरूप संसारसे सदाके लिये मुक्त होकर उस परब्रह्मको प्राप्त हो जानारूप फल बतानेवाले लक्षणोंकी अधिकता होनेके कारण; तद्बलीयः = वही फल बलवान् (मुख्य) है; हि = क्योंकि; तदपि = वह दूसरे फलोंका वर्णन भी मुख्य फलका महत्त्व प्रकट करनेके लिये ही है। १-यह मन्त्र सूत्र ३।३।३० की व्याख्यामें आया है। २-यह मन्त्र सूत्र ३।४।५२ की टिप्पणीमें आया है।