वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र ५८-५९ ] अध्याय ३ ३६५ उपासनाका अधिक फल बताया गया है। इसलिये यही सिद्ध होता है कि एक-एक अंगकी उपासनाकी अपेक्षा पूर्ण उपासना श्रेष्ठ है। अतः पूर्ण उपासनाका ही अनुष्ठान करना चाहिये। सम्बन्ध — नाना प्रकारसे बतायी हुई ब्रह्मविद्या भिन्न-भिन्न है कि एक ही है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— नाना शब्दादिभेदात् ॥ ३।३।५८ ॥ शब्दादिभेदात् = शब्द आदिका भेद होनेके कारण; नाना = सब विद्याएँ अलग-अलग हैं। व्याख्या — सद्विद्या, भूमविद्या, दहरविद्या, उपकोसलविद्या, शाण्डिल्यविद्या, वैश्वानरविद्या, आनन्दमयविद्या, अक्षरविद्या इत्यादि भिन्न-भिन्न नाम और विधि-विधानवाली इन विद्याओंमें नाम और प्रकार आदिका भेद है। किसी अधिकारीके लिये एक विद्या उपयुक्त होती है, तो अन्यके लिये दूसरी ही उपयुक्त होती है; इसलिये सबका फल एक ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर भी एक नहीं है, भिन्न-भिन्न है। सम्बन्ध — इन सबके समुच्चयका विधान है या विकल्पका अर्थात् इन सबको मिलाकर अनुष्ठान करना चाहिये या एक-एकका अलग-अलग ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विकल्पोऽविशिष्टफलत्वात् ॥ ३।३।५९ ॥ अविशिष्टफलत्वात् = सब विद्याओंका एक ही फल है, फलमें भेद नहीं है, इसलिये; विकल्पः = अलग-अलग अनुष्ठान करना ही उचित है। व्याख्या — जिस प्रकार स्वर्गादिकी प्राप्तिके साधनभूत जो भिन्न- भिन्न यज्ञ-याग आदि बताये गये हैं, उनमेंसे जिन-जिनका फल एक है, उनका समुच्चय नहीं होता। यजमान अपने इच्छानुसार उनमेंसे किसी भी एक यज्ञका अनुष्ठान कर सकता है। इसी प्रकार उपर्युक्त विद्याओंका ब्रह्मसाक्षात्काररूप एक ही फल होनेके कारण उनके समुच्चयकी