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वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished486 pages

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४०२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ मानते हैं, (इसलिये वे); अशनवत् = भोजनके नियमभंगके प्रायश्चित्तकी भाँति; भावम् = इसके लिये भी प्रायश्चित्तका भाव मानते हैं; तदुक्तम् = यह बात शास्त्रमें कही है (यह भी उनका कहना है)। व्याख्या—कई एक आचार्योंका कहना है कि जिस प्रकार ब्रह्मचारी अपने व्रतसे भ्रष्ट होकर प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है, वैसे ही वानप्रस्थी और संन्यासियोंका भी प्रायश्चित्तमें अधिकार है; क्योंकि यह महापातक नहीं है, किंतु उपपातक है और उपपातकके प्रायश्चित्तका शास्त्रमें विधान है ही। अतः अभक्ष्य-भक्षण आदिके प्रायश्चित्तकी भाँति इसका भी प्रायश्चित्त अवश्य होना उचित है। सम्बन्ध—इसपर आचार्य अपनी सम्मति बताते हैं— बहिस्तूभयथापि स्मृतेराचाराच्च ॥ ३।४।४३॥ तु = किंतु; उभयथापि = दोनों प्रकारसे ही; बहिः = वह अधिकारसे बहिष्कृत है; स्मृतेः = क्योंकि स्मृतिप्रमाणसे; च = और; आचारात् = शिष्टाचारसे भी (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—वे उच्च आश्रमसे पतित हुए संन्यासी और वानप्रस्थी लोग महापातकी हों या उपपातकी, दोनों प्रकारसे ही शिष्ट सम्प्रदाय और वैदिक ब्रह्मविद्याके अधिकारसे सर्वथा बहिष्कृत हैं; क्योंकि स्मृतिप्रमाण और शिष्टोंके आचार-व्यवहारसे यही बात सिद्ध होती है। उनका पतन भोगोंकी आसक्तिसे ही होता है। अतः वे ब्रह्मविद्याके अधिकारी नहीं हैं। श्रेष्ठ पुरुष उनके साथ यज्ञ, स्वाध्याय और विवाह आदि सम्बन्ध भी नहीं करते हैं। सम्बन्ध—इस प्रकार उच्च आश्रमसे भ्रष्ट हुए द्विजोंका विद्यामें अधिकार नहीं है, यह सिद्ध किया गया। अब जो कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ आदिमें उपासना की जाती है, उसका कर्ता यजमान होता है या कर्म करनेवाला ऋत्विक्—इसपर विचार करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—