वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 427 of 486
Read in contextदूसरा पाद पहले पादमें उपासनाविषयक निर्णय करके जिन जीवन्मुक्त महापुरुषोंका ब्रह्मलोकादिमें गमन नहीं होता, उनको किस प्रकार परमात्माकी प्राप्ति होती है, इस विषयपर विचार किया गया। अब इस दूसरे पादमें, जो ब्रह्मविद्याके उपासक ब्रह्मलोकमें जाते हैं, उनकी गतिका प्रकार बताया जाता है। साधारण मनुष्योंकी और ब्रह्मविद्याके उपासककी गतिमें कहाँतक समानता है, यह स्पष्ट करनेके लिये पहले साधारण गतिके वर्णनसे प्रकरण आरम्भ किया जाता है— वाङ्मनसि दर्शनाच्छब्दाच्च ॥ ४ । २ । १ ॥ वाक्=वाणी; मनसि=मनमें स्थित हो जाती है; दर्शनात्=प्रत्यक्ष देखनेसे; च=और; शब्दात्=वेद-वाणीसे भी यह बात सिद्ध होती है। व्याख्या—श्रुतिमें यह कहा गया है कि—‘अस्य सोम्य पुरुषस्य प्रयतो वाङ्मनसि सम्पद्यते मनः प्राणे प्राणस्तेजसि तेजः परस्यां देवतायाम्॥’ ‘इस मनुष्यके मरकर एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाते समय वाणी मनमें स्थित होती है, मन प्राणमें और प्राण तेजमें तथा तेज परदेवतामें स्थित होता है। (छा० उ० ६।८।६) इस वाक्यमें जो वाणीका मनमें स्थित होना कहा गया है, वह वाक्-इन्द्रियका ही स्थित होना है, केवल उसकी वृत्तिमात्रका नहीं; क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि मरणासन्न मनुष्यमें मन विद्यमान रहते हुए ही वाक्-इन्द्रियका कार्य बंद हो जाता है तथा श्रुतिमें तो स्पष्ट शब्दोंमें यह बात कही ही है। सम्बन्ध—‘वाणी मनमें स्थित हो जाती है', यह कहनेके बाद वहाँ अन्य इन्द्रियोंके विषयमें कुछ नहीं कहा गया। केवल मनकी प्राणमें स्थिति बतायी गयी, अतः अन्य इन्द्रियोंके विषयमें क्या समझना चाहिये ? इसपर कहते हैं— अत एव च सर्वाण्यनु ॥ ४ । २ । २ ॥