वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context४५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४
क्योंकि श्रुतिमें इस प्रकार कहा है—'स वा एष एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान् कामान् पश्यन् रमते ॥ य एते ब्रह्मलोके ।' (छा० उ० ८। १२। ५-६) 'निश्चय ही वह यह आत्मा इस दिव्य नेत्र मनके द्वारा जो ये ब्रह्मलोकके भोग हैं, इनको देखता हुआ रमण करता है।' इसके सिवा उसका अपने दिव्य्यरूपसे सम्पन्न होना भी कहा है (८।१२।२)। दिव्य रूप स्थूल देहके बन्धनसे रहित होता है। इसलिये कार्यब्रह्मके लोकमें गये हुए मुक्तात्माके स्थूल शरीरका अभाव मानना ही उचित है (८।१३।१)। सम्बन्ध—इस विषयमें आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— भावं जैमिनिर्विकल्पामननात् ॥ ४।४।११ ॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; भावम्=मुक्तात्माके शरीरका अस्तित्व मानते हैं; विकल्पामननात्=क्योंकि कई प्रकारसे स्थित होनेका श्रुतिमें वर्णन आता है। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कहना है कि 'मुक्तात्मा एक प्रकारसे होता है, तीन प्रकारसे होता है, पाँच प्रकारसे होता है, सात प्रकारसे, नौ प्रकारसे तथा ग्यारह प्रकारसे होता है, ऐसा कहा गया है।' (छा० उ० ७। २६ । २) इस तरह श्रुतिमें उसका नाना भावोंसे युक्त होना कहा है, इससे यही सिद्ध होता है कि उसके स्थूल शरीरका भाव है अर्थात् वह शरीरसे युक्त होता है, अन्यथा इस प्रकार श्रुतिका कहना संगत नहीं हो सकता। सम्बन्ध—अब इस विषयमें आचार्य बादरायण अपना मत प्रकट करते हैं— द्वादशाहवदुभयविधं बादरायणोऽतः ॥ ४।४।१२ ॥ बादरायणः=वेदव्यासजी कहते हैं कि; अतः=पूर्वोक्त दोनों मतोंसे; द्वादशाहवत्=द्वादशाह यज्ञकी भाँति; उभयविधम्=दोनों प्रकारकी स्थिति उचित है। व्याख्या—वेदव्यासजी कहते हैं कि दोनों आचार्योंका कथन प्रमाणयुक्त है; अतः उपासकके संकल्पानुसार शरीरका रहना और न रहना दोनों ही सम्भव