वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context५६ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ कर्मोंके फलका भोगनेवाला बताया गया है, उसका यह भाव है कि परब्रह्म परमेश्वर ही समस्त देवता आदिके रूपमें प्रकारान्तरसे समस्त यज्ञ और तपरूप शुभ कर्मोंके भोक्ता हैं।१ परंतु उनका भोक्तापन सर्वथा निर्दोष है, इसलिये वे भोक्ता होते हुए भी अभोक्ता ही हैं।२ सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनकी सिद्धिके लिये ही दूसरा हेतु उपस्थित करते हैं— विशेषणाच्च ॥ १ । २ । १२ ॥ विशेषणात्=(आगेके मन्त्रोंमें) दोनोंके लिये अलग-अलग विशेषण दिये गये हैं, इसलिये; च=भी (उपर्युक्त दोनों भोक्ताओंको जीवात्मा और परमात्मा मानना ही ठीक है)। व्याख्या—इसी अध्यायके दूसरे मन्त्रमें उस परम अक्षर ब्रह्मको संसारसे पार होनेकी इच्छावालोंके लिये 'अभयपद' बताया गया है। तथा उसके बाद रथके दृष्टान्तमें जीवात्माको रथी और उस परब्रह्म परमेश्वरको प्राप्तव्य परमधामके नामसे कहा गया है। इस प्रकार उन दोनोंके लिये पृथक्-पृथक् विशेषण होनेसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ जिनको गुहामें प्रविष्ट बताया गया है, वे जीवात्मा और परमात्मा ही हैं। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि परमात्माकी उपलब्धि हृदयमें होती है, इसलिये उसे हृदयमें स्थित बताना तो ठीक है, परंतु छान्दोग्योपनिषद् (४। १५। १)-में ऐसा कहा है कि 'यह जो नेत्रमें पुरुष दीखता है, यह आत्मा है, यही अमृत है, यही अभय और ब्रह्म है।' अतः यहाँ नेत्रमें स्थित पुरुष कौन है? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— १-भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्। सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥ (गीता ५।२९) अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। (गीता ९।२४) २-सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ (गीता १३।१४)