वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in contextसूत्र १४-१५ ] अध्याय १ ५९ इस प्रकरणको देखनेसे मालूम होता है कि आँखके भीतर दीखनेवाला पुरुष परब्रह्म ही है, जीवात्मा या प्रतिबिम्बके लिये यह कथन नहीं है, क्योंकि ब्रह्मविद्याके प्रसंगमें उसका वर्णन करके उसे आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म कहा है। इन विशेषणोंकी उपपत्ति ब्रह्ममें ही लग सकती है, अन्य किसीमें नहीं। सम्बन्ध — अब यह जिज्ञासा होती है कि यहाँ ब्रह्मको आँखमें दीखनेवाला पुरुष क्यों कहा गया ? वह किसी स्थानविशेषमें रहनेवाला थोड़े ही है ? इसपर कहते हैं— स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । १४ ॥ स्थानादिव्यपदेशात् = श्रुतिमें अनेक स्थलोंपर ब्रह्मके लिये स्थान आदिका निर्देश किया गया है, इसलिये; च = भी (नेत्रान्तर्वर्ती पुरुष यहाँ ब्रह्म ही है)। व्याख्या — श्रुतिमें जगह-जगह ब्रह्मको समझानेके लिये उसके स्थान तथा नाम, रूप आदिका वर्णन किया गया है। जैसे अन्तर्यामि- ब्राह्मण (बृह० उ० ३ । ७ । ३—२३) - में ब्रह्मको पृथ्वी आदि अनेक स्थानोंमें स्थित बताया गया है। इसी प्रकार अन्य श्रुतियोंमें भी वर्णन आया है। अतः यहाँ ब्रह्मको नेत्रमें दीखनेवाला कहना अयुक्त नहीं है; क्योंकि ब्रह्म निर्लिप्त है और आँखमें दीखनेवाला पुरुष भी आँखके दोषोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। इस समानताको लेकर ब्रह्मका तत्त्व समझानेके लिये ऐसा कहना उचित ही है। इसलिये यहाँ यह भी कहा है कि ‘आँखमें घी या पानी आदि जो भी वस्तु डाली जाती है, वह आँखकी पलकोंमें ही रहती है, द्रष्टा पुरुषका स्पर्श नहीं कर सकती।' सम्बन्ध — उक्त सिद्धान्तको दृढ़ करनेके लिये दूसरी युक्ति देते हैं— सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १ । २ । १५ ॥ च = तथा; सुखविशिष्टाभिधानात् = नेत्रान्तर्वर्ती पुरुषको आनन्दयुक्त बताया गया है, इसलिये; एव = भी (यही सिद्ध होता है कि वह ब्रह्म ही है)।