वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 67 of 486
Read in contextअन्तर्यामीको पृथिवी आदिकी भाँति जीवात्माके भी भीतर रहकर उसका नियमन करनेवाला मानते हैं। वहाँ जीवात्माको नियम्य और अन्तर्यामीको नियन्ता बताया गया है। इस प्रकार जीवात्मा और परमात्मा इन दोनोंका पृथक्-पृथक् वर्णन होनेके कारण वहाँ 'अन्तर्यामी' पद परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उन्नीसवें सूत्रमें यह बात कही गयी है कि द्रष्टापन आदि चेतनके धर्म जड प्रकृतिमें नहीं घट सकते; इसलिये वह अन्तर्यामी नहीं हो सकती। इसपर यह जिज्ञासा होती है कि मुण्डकोपनिषद्में जिसको अदृश्यता, अग्राह्यता आदि धर्मोंसे युक्त बतलाकर अन्तमें भूतोंका कारण बताया गया है, वह तो प्रकृति हो सकती है; क्योंकि उस जगह बताये हुए सभी धर्म प्रकृतिमें पाये जाते हैं। इसपर कहते हैं— अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ १ । २ । २१ ॥ अदृश्यत्वादिगुणकः = अदृश्यता आदि गुणोंवाला परब्रह्म परमेश्वर ही है; धर्मोक्तेः = क्योंकि उस जगह उसीके सर्वज्ञता आदि धर्मोंका वर्णन है। व्याख्या—मुण्डकोपनिषद्में यह प्रसंग आया है कि महर्षि शौनक विधिपूर्वक अंगिरा ऋषिकी शरणमें गये। वहाँ जाकर उन्होंने पूछा— 'भगवन् ! किसको जान लेनेपर यह सब कुछ जाना हुआ हो जाता है?' इसपर अंगिराने कहा—'जाननेयोग्य विद्याएँ दो हैं, एक अपरा, दूसरी परा। उनमेंसे अपरा विद्या तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष है और परा वह है, जिससे उस अक्षर ब्रह्मको जाना जाता है।' यह कहकर उस अक्षरको समझानेके लिये मन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः ॥' (बृ० उ० ३। ७। २२) 'जो जीवात्मामें रहनेवाला, जीवात्माके भीतर है, जिसे जीवात्मा नहीं जानता, जीवात्मा जिसका शरीर है और जो उसके भीतर रहकर जीवात्माका नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।'