वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
Page 75 of 486
Read in context७२ वेदान्त-दर्शन [ पाद २ शिलामें विष्णुकी उपासनाके सदृश यहाँ 'वैश्वानर' नामक जठराग्निमें परमेश्वरकी प्रतीकोपासना बतलानेके लिये 'वैश्वानर' नामसे उस ब्रह्मका वर्णन है, अतः इसपर सूत्रकार आचार्य जैमिनिका मत बतलाते हैं— साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ॥ १ । २ । २८ ॥ साक्षात् = 'वैश्वानर' शब्दको साक्षात् परब्रह्मका वाचक माननेमें; अपि = भी; अविरोधम् = कोई विरोध नहीं है, ऐसा; जैमिनिः (आह) = आचार्य जैमिनि कहते हैं। व्याख्या—आचार्य जैमिनिका कथन है कि वैश्वानर शब्दको साक्षात् विश्वरूप परमात्माका वाचक माननेमें कोई विरोध नहीं है। अतः यहाँ जठराग्निको प्रतीक मानकर उसके रूपमें परमात्माकी उपासना माननेकी कोई आवश्यकता नहीं है। सम्बन्ध—उपर्युक्त सूत्रोंद्वारा यह बात सिद्ध हो गयी कि 'वैश्वानर' नामसे इस प्रकरणमें परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन किया गया है, परंतु निर्विकार निराकार अव्यक्त परब्रह्म परमात्माको इस प्रकार साकार विराट्रूपमें देश-विशेषसे सम्बद्ध बतलाना किस अभिप्रायसे है? निर्गुण-निराकारको सगुण-साकार बताना विरुद्ध-सा प्रतीत होता है। इसपर २९ वें सूत्रसे ३१ वें तक विभिन्न आचार्योंका मत बताते हुए अन्तमें ३२ वें सूत्रमें अपना सिद्धान्त कहकर सूत्रकार इस दूसरे पादको समाप्त करते हैं— अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ॥ १ । २ । २९ ॥ अभिव्यक्तेः = (भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये) देश-विशेषमें ब्रह्मका प्राकट्य होता है, इसलिये; (अविरोधः =) कोई विरोध नहीं है; इति = ऐसा; आश्मरथ्यः = आश्मरथ्य आचार्य मानते हैं। व्याख्या—आश्मरथ्य आचार्यका कहना है कि भक्तजनोंपर अनुग्रह करके उन्हें दर्शन देनेके लिये भगवान् समय-समयपर उनकी श्रद्धाके अनुसार नाना रूपोंमें प्रकट होते हैं; तथा अपने भक्तोंको दर्शन, स्पर्श और प्रेमालाप आदिके द्वारा सुख पहुँचाने, उनका उद्धार करने और जगत्में अपनी कीर्ति