वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context८४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सम्बन्ध - कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं। जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतानुसार यहाँ 'अक्षर' शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है। इस शंकाका निवारण करनेके लिये कहते हैं- सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और; सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोंको धारण करनारूप क्रिया (परमेश्वरकी ही है); प्रशासनात् =क्योंकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है। व्याख्या- इस प्रकरणमें आगे चलकर कहा है कि 'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठत एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि द्यावापृथिव्यौ विधृते तिष्ठत - इत्यादि' अर्थात् 'इसी अक्षरके प्रशासनमें सूर्य और चन्द्रमा धारण किये हुए स्थित हैं, एवं द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोंसे कहा जानेवाला काल - ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित हैं। इसीके प्रशासनमें पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियाँ अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोंसे निकलकर बहती हैं।' इत्यादि। (बृह० उ० ३।८।९) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है। यह कार्य जडप्रकृतिका नहीं हो सकता। अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं। सम्बन्ध - इसके सिवा- अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः = यहाँ अक्षरमें अन्य (प्रधान आदि)-के लक्षणोंका निराकरण किया गया है इसलिये; च = भी ('अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है)।