वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
by भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (origin)
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Read in context८६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमें जाता है तथा जिस प्रकार सर्प केंचुलीसे अलग हो जाता है, ठीक उसी तरह वह पापोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। इसके बाद वह सामवेदकी श्रुतियोंद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमें ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदायरूप परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष पुरुषोत्तमको साक्षात् कर लेता है।' इस मन्त्रमें जिसको तीनों मात्राओंसे सम्पन्न ॐकारके द्वारा ध्येय बतलाया गया है, वह पूर्ण ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योंकि उस ध्येयको, जीव- समुदायके नामसे वर्णित हिरण्यगर्भरूप अपरब्रह्मसे अत्यन्त श्रेष्ठ बताकर ‘ईक्षते’ क्रियाका कर्म बतलाया गया है। सम्बन्ध—उपर्युक्त प्रकरणमें मनुष्यशरीररूप पुरमें शयन करनेवाले पुरुषको परब्रह्म परमात्मा सिद्ध किया गया है। किंतु छान्दोग्योपनिषद् (८। १।१)-में ब्रह्मपुरान्तर्गत दहर (सूक्ष्म) आकाशका वर्णन करके उसमें स्थित वस्तुको जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ नामसे कहा हुआ तत्त्व क्या है? इसपर कहते हैं— दहर उत्तरेभ्यः ॥ १। ३। १४॥ दहरः = उक्त प्रकरणमें ‘दहर’ शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः = क्योंकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोंसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—छान्दोग्य० (८।१।१)-में कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्म, पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्त- दन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम्।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य- शरीरमें कमलके आकारवाला एक घर (हृदय) है, उसमें सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमें जिसे ज्ञातव्य बताया गया है, वह ‘दहर’ शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योंकि आगेके वर्णनमें इसीके भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है