ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in contextश्रीकृष्णजन्मखण्ड ५७७
एकतानता, एक मनोहर मौन, गुरु-लघुके क्रमसे पद-भेद-विराम, अतिदीर्घ गमक तथा मधुर आनन्दके साथ उन्होंने प्रेमपूर्वक स्वयं-निर्मित ऐसा संगीत छेड़ा, जो संसारमें अत्यन्त दुर्लभ है। उस समय भगवान् शिवके सम्पूर्ण अङ्गोंमें रोमाञ्च हो आया था और वे नेत्रोंसे बारंबार आँसू बहाते थे। प्रिये! उस संगीतको सुननेमात्रसे वहाँ बैठे हुए मुनि तथा देवता मूर्च्छित एवं बेसुध हो द्रव (जल)-रूप हो गये। श्रीहरिके पार्षदोंकी तथा ब्रह्माजीकी भी यही दशा हुई। भगवान् नारायण, लक्ष्मी तथा गान करनेवाले स्वयं शिव भी द्रवरूप हो गये। प्राणेश्वरि! उस समय वैकुण्ठधामको जलसे पूर्ण हुआ देख मुझे शङ्का हुई। तब वहाँ जाकर मैंने उन सब देवता आदिकी मूर्तियों (शरीरों)-का पूर्ववत् निर्माण किया। उनके वैसे ही रूप, वैसे ही अस्त्र-शस्त्र तथा वैसे ही वाहन-भूषण बनाये। उनके स्वभाव, मन तथा विषय-वासनाएँ भी पूर्ववत् थीं। तदनन्तर उस जलराशिके लिये वैकुण्ठके चारों ओर स्थान बनाया; फिर उसकी अधिष्ठात्री देवी (गङ्गा) अपने उस वासस्थानमें आयीं।
समस्त देवताओंके शरीरोंसे उत्पन्न हुई वह
रागोंके नामोंके सम्बन्धमें बहुत मतभेद है। भरत और हनुमत्के मतसे ये छः राग इस प्रकार हैं—भैरव, कौशिक (मालकोस), हिंडोल, दीपक, श्री और मेघ। सोमेश्वर और ब्रह्माके मतसे इन छः रागोंके नाम इस प्रकार हैं—श्री, वसंत, पञ्चम, भैरव, मेघ और नटनारायण। नारद-संहिताका मत है कि मालव, मल्हार, श्री, वसंत, हिंडोल और कर्णाट—ये छः राग हैं। परंतु आजकल प्रायः ब्रह्मा और सोमेश्वरका मत ही अधिक प्रचलित है। स्वर-भेदसे राग तीन प्रकारके कहे गये हैं—(१) सम्पूर्ण, जिसमें सातों स्वर लगते हों; (२) षाड़व, जिसमें केवल छः स्वर लगते हों और कोई एक स्वर वर्जित हो; और (३) ओड़व, जिसमें केवल पाँच स्वर लगते हों और दो स्वर वर्जित हों। मतङ्गके मतसे रागोंके ये तीन भेद हैं—(१) शुद्ध, जो शास्त्रीय नियम तथा विधानके अनुसार हो और जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया न हो; (२) सालंक या छायालग, जिसमें किसी दूसरे रागकी छाया भी दिखायी देती हो अथवा जो दो रागोंके योगसे बना हो और (३) संकीर्ण, जो कई रागोंके मेलसे बना हो। संकीर्णको ‘संकर राग’ भी कहते हैं। ऊपर जिन छः रागोंके नाम बतलाये गये हैं, उनमेंसे प्रत्येक रागका एक निश्चित सरगम या स्वर-क्रम है। उसका एक विशिष्ट स्वरूप माना गया है। उसके लिये एक विशिष्ट ऋतु, समय और पहर आदि निश्चित हैं। उसके लिये कुछ रस नियत हैं तथा अनेक ऐसी बातें भी कही गयी हैं, जिनमेंसे अधिकांश केवल कल्पित ही हैं। जैसे, माना गया है कि अमुक रागका अमुक द्वीप या वर्षपर अधिकार है, उसका अधिपति अमुक ग्रह है, आदि। इसके अतिरिक्त भरत और हनुमत्के मतसे प्रत्येक रागकी पाँच-पाँच रागिनियाँ और सोमेश्वर आदिके मतसे छः-छः रागिनियाँ हैं। इस अन्तिम मतके अनुसार प्रत्येक रागके आठ-आठ पुत्र तथा आठ-आठ पुत्रवधुएँ भी हैं। (४) यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो राग और रागिनीमें कोई अन्तर नहीं है। जो कुछ अन्तर है, वह केवल कल्पित है। हाँ, रागोंमें रागिनियोंकी अपेक्षा कुछ विशेषता और प्रधानता अवश्य होती है और रागिनियाँ उनकी छायासे युक्त जान पड़ती हैं; अतः हम रागिनियोंको रागोंके अवान्तर भेद कह सकते हैं। इसके सिवा और भी बहुत-से राग हैं, जो कई रागोंकी छायापर अथवा मेलसे बनते हैं और ‘संकर राग’ कहलाते हैं। शुद्ध रागोंकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें लोगोंका विश्वास है कि जिस प्रकार श्रीकृष्णकी वंशीके सात छेदोंमेंसे सात स्वर निकले हैं, उसी प्रकार श्रीकृष्णजीकी १६०८ गोपिकाओंके गानेसे १६०८ प्रकारके राग उत्पन्न हुए थे और उन्हींमेंसे बचते-बचते अन्तमें केवल छः राग और उनकी ३० या ३६ रागिनियाँ रह गयीं। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि महादेवजीके पाँच मुखोंसे पाँच राग (श्री, वसंत, भैरव, पञ्चम और मेघ) निकले हैं और पार्वतीके मुखसे छठा ‘नटनारायण’ राग निकला है।
१- संगीत-शास्त्रके अनुसार तालमेंका विराम जो सम, विषम, अतीत और अनागत—चार प्रकारका होता है।
२- संगीतमें एक श्रुति या स्वरपरसे दूसरी श्रुति या स्वरपर जानेका एक प्रकार। इसके सात भेद हैं—कम्पित, स्फुरित, लीन, भिन्न, स्थविर, आहत और आन्दोलित। पर साधारणतः लोग गानेमें स्वरके कँपानेको ही गमक कहते हैं। तबलेकी गम्भीर आवाजको भी गमक कहते हैं।
(हिंदी-शब्दसागरसे संकलित)