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ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished810 pages

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Page 751

· श्रीकृष्णजन्मखण्ड · ७४१

मरवा डाला। इसके बाद नगर-निर्माणका क्रम चालू किया।

**श्रीभगवान्ने कहा—**विश्वकर्मन्! तुम पद्मराग, मरकत, सर्वश्रेष्ठ इन्द्रनील, मनोहर पारिभद्र, पलंक, स्यमन्तक, गन्धक, गालिम, चन्द्रकान्त, सूर्यकान्त, स्फटिककी रची हुई पुतलियों, पीली-श्याम-श्वेत और नीली मणियों, दाडिमी-बीजके सदृश पीली गोरोचना, पद्म-बीजके सदृश, नीले कमलके-से रंगवाली, कज्जलके-से आकारवाली, उज्ज्वल, परिष्कृत, श्वेत चम्पकके सदृश कान्तिमती, तपाये हुए स्वर्णकी-सी चमकीली, स्वर्णके मूल्यसे सौगुनी अधिक मूल्यवाली, थोड़ी-थोड़ी लाल, परम सुन्दर, वजनदार, सर्वोत्तम और पूजनीय उत्तम मणियोंद्वारा वास्तु-शास्त्रके विधानानुसार यथायोग्य घटा-बढ़ाकर एक ऐसे मनोवाञ्छित परम मनोहर नगरकी रचना करो, जो सौ योजनके विस्तारवाला हो। जबतक तुम नगरका निर्माण करोगे, तबतक यक्षगण हिमालयसे रात-दिन मणियोंको लाते रहेंगे। कुबेरकी प्रेरणासे आये हुए सात लाख यक्ष, शंकरद्वारा भेजे हुए एक लाख बेताल और एक लाख कूष्माण्ड तथा गिरिराजनन्दिनीद्वारा नियुक्त किये हुए दानव और ब्रह्मराक्षस तुम्हारे सहायक बने रहेंगे। मेरी सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियोंके लिये ऐसे दिव्य शिविर तैयार करो, जो खाइयोंसे युक्त तथा ऊँची-ऊँची चहारदीवारियोंसे परिवेष्टित हों। जिनमें प्रत्येकमें बारह कमरे और सिंहद्वार लगे हों, जो चित्र-विचित्र कृत्रिम किवाड़ोंसे युक्त हों; निषिद्ध वृक्षोंसे रहित और प्रसिद्ध वृक्षोंसे सम्पन्न हों और जिनके आँगन शुभ लक्षणयुक्त और चन्द्रवेध हों। इसी प्रकार यदुवंशियों और नौकरोंके लिये भी दिव्य आश्रम बनाओ। भूपाल उग्रसेनका भवन सर्वप्रसिद्ध तथा मेरे पिता वसुदेवजीका आश्रम सर्वतोभद्र होना चाहिये।

**तब विश्वकर्मा बोले—**जगद्गुरो! वे प्रशस्त वृक्ष कौन-कौन हैं और कौन निषिद्ध हैं तथा शुभ-अशुभ प्रदान करनेवाले कौन हैं? उन सबका परिचय दीजिये। प्रभो! साथ ही यह भी बतलाइये कि किनकी अस्थि पड़नेसे शिविर शुभ और किनकी अस्थिसे अशुभ होता है? शिविरकी किस दिशामें जल मङ्गलकारक और किस दिशामें अमाङ्गलिक होता है? और कौन वृक्ष किस दिशामें कल्याणप्रद होता है? सुरेश्वर! गृहों तथा अँगनोंका विस्तार कितना होना चाहिये? किस दिशामें पुष्पोद्यान मङ्गलप्रद होता है? सुरेश्वर! परकोटों, खाइयों, दरवाजों, गृहों और चहारदीवारियोंका क्या प्रमाण है? प्रभो! शिविर-निर्माणमें किस-किस वृक्षकी लकड़ी प्रशस्त मानी गयी है और किन वृक्षोंके काष्ठ अमङ्गलजनक होते हैं? यह सब मुझे बतलानेकी कृपा कीजिये।

**श्रीभगवान्ने कहा—**देवशिल्पिन्! गृहस्थोंके आश्रममें नारियलका वृक्ष धन प्रदान करनेवाला होता है। वही वृक्ष यदि शिविरके ईशानकोण अथवा पूर्व दिशामें हो तो पुत्रप्रद होता है। वह मनोहर वृक्षराज सर्वत्र मङ्गलका दाता होता है। यदि पूर्व दिशामें आमका वृक्ष हो तो वह मनुष्योंको सम्पत्ति प्रदान करता है और सर्वत्र शुभदायक होता है। बेल, कटहल, जम्बीरी नींबू तथा बेरके वृक्ष पूर्व दिशामें संतानदायक, दक्षिणमें धनदाता तथा सर्वत्र सम्पत्तिप्रद होते हैं। इनसे गृहस्थकी उन्नति होती है। जामुन, अनार, केला तथा आमलाके वृक्ष पूर्वमें बन्धुप्रद तथा दक्षिणमें मित्रकी वृद्धि करनेवाले होते हैं और सर्वत्र शुभदायक होते हैं। सुवाक दक्षिणमें धन-पुत्र-शुभप्रद, पश्चिममें हर्षदायक और ईशानकोणमें तथा सर्वत्र सुखद होता है। भूतलपर चम्पाका वृक्ष शुद्ध तथा सर्वत्र मङ्गलकारक होता है। लौकी, कुम्हड़ा, आयाम्बु, पलाश, खजूर और कर्कटीके वृक्ष शिविरमें मङ्गलप्रद होते हैं। विश्वकर्मन्! बेल और बैंगनके पौधे भी शुभदायक