ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
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अधीन होओगी। शम्बरासुर इन्द्रसहित देवताओंको जीतकर तुम्हें हर ले जायगा।' यों कहकर उन्होंने पुनः वरदान भी दिया—'तुम्हारा सतीत्व नष्ट नहीं होगा। जबतक तुम्हारा पति जीवित नहीं हो जाता, तबतक तुम शम्बरासुरको अपनी छाया देकर उसके घरमें वास करो।' दैत्येन्द्र! इस प्रकार मैंने तुमसे वह सारा पुरातन इतिहास कह सुनाया; अब देवोंके गुप्त चरित्रको श्रवण करो।
इसी समय बाणका प्रधान सेनापति महाबली सुभद्रने, जो कुम्भाण्डका भाई, बलसम्पन्न और महारथी था, शस्त्रोंसे लैस होकर समरभूमिमें बाणकी निर्भर्त्सना करके श्रीकृष्णपौत्र अनिरुद्धपर प्रलयाग्निकी भाँति चमकीला त्रिशूल चलाया; परंतु प्रद्युम्नकुमारने एक अर्धचन्द्रद्वारा उस शूलके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तब सुभद्रने सैकड़ों सूर्योंके समान प्रभावाली शक्ति फेंकी। अनिरुद्धने वैष्णवास्त्रद्वारा उस शक्तिको भी काट गिराया। फिर तो घोर संग्राम आरम्भ हो गया। अनिरुद्धने सुभद्रको मार गिराया। तदनन्तर बाणके साथ भयंकर युद्ध हुआ। जब अनिरुद्ध बाणासुरका वध करनेको उद्यत हुए, तब कार्तिकेयने उसे बचा लिया। फिर कार्तिकेयके साथ उनका महान् संग्राम हुआ।
(अध्याय ११६)
गणेश-शिव-संवाद
**श्रीनारायण कहते हैं—**नारद! इसी समय गणेशने शिवजीके स्थानपर जाकर उन महेश्वरको नमस्कार किया और बाण-अनिरुद्धका युद्ध, सुभद्राका वध, स्कन्द और अनिरुद्धका युद्ध तथा अनिरुद्धका प्रबल पराक्रम—यह सारा वृत्तान्त क्रमशः पृथक्-पृथक् कह सुनाया। गणेशका कथन सुनकर भगवान् शंकर हँस पड़े और कोमल वाणीद्वारा परम गुप्त एवं वेदसम्मत वचन बोले।
**श्रीमहादेवजीने कहा—**महाभाग गणेश्वर! मेरा वचन, जो हितकारक, तथ्य, नीतिका साररूप तथा परिणाममें सुखदायक है, उसे श्रवण करो। असंख्य विश्वोंका समुदाय, कृष्णकुमार प्रद्युम्न, अनिरुद्ध तथा जो कार्य और कारणोंका कारण है, वह सब कुछ श्रीकृष्णको ही जानो। गणेश्वर! ब्रह्मासे लेकर तृणपर्यन्त सारा जगत् सनातन भगवान् श्रीकृष्णका स्वरूप है—इसे सत्य समझो। जो गोलोकमें दो भुजाधारी, शान्त, राधाके प्रियतम, मनोहर रूपवाले, शिशुरूप, गोप-वेषधारी, परिपूर्णतम प्रभु हैं; गोपियों, गोपसमुदायों तथा कामधेनुओंसे घिरे रहते हैं; पवित्र रमणीय वृन्दावनके रासमण्डलमें जो हाथमें मुरली लिये विचरते रहते हैं; ब्रह्मा, शिव, शेष जिनकी वन्दना करते हैं; जो शैलराज शतशृङ्गपर वटकी शान्त छायामें तथा भाण्डीरके निकट विरजा नदीके निर्मल तटपर स्थित गोष्ठमें विहार करते हैं; जिनके शरीरका वर्ण नूतन जलधरके समान श्याम है, पीताम्बरद्वारा जिनकी उसी प्रकार शोभा होती है, जैसे मेघोंकी नयी घटा बिजलीसे सुशोभित होती है। उस सबका गोलोकस्थित रासमण्डलमें आविर्भाव होता है। रमणीय गोकुल तथा पुण्य वृन्दावनमें जितने जीव हैं, वे सभी उस परम पुरुषकी अंशकलाएँ हैं; किंतु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। परिपूर्णतम काम ब्रह्मशापके कारण अपनेको भूल गया है। अनिरुद्ध उसी कामके पुत्र हैं, जो महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं। इस अत्यन्त भयंकर महायुद्धमें मैंने ही स्कन्दको भेजा है। इस संग्राममें बाण मर चुका था; परंतु उस स्कन्दने ही उसे बचा लिया है। गणेश्वर! युद्धमें स्कन्द और अनिरुद्धकी समानता तो है,