ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
Page 131 of 417
Read in context११० वेदान्त-दर्शन [ पाद १ आ जानेसे भोक्ता ( जीवात्मा ) और भोग्य ( जडवर्ग ) का भी विभाग असम्भव हो जायगा; तो ऐसी बात नहीं है; क्योकि लोकमे एक कारणसे उत्पन्न हुई वस्तुओमें ऐसा विभाग प्रत्यक्ष देखा जाता है; उसी प्रकार ब्रह्म और जीवात्मा तथा जीव और जडवर्गका विभाग होनेमे भी कोई बाधा नहीं रहेगी। अर्थात् लोकमे जैसे यह बात देखी जाती है कि पिताका अंशभूत बालक जब गर्भमे रहता है तो गर्भजनित पीड़ाका भोक्ता वही होता है, पिता नहीं होता। तथा उस बालक और पिताका विभाग भी प्रत्यक्ष देखा जाता है। उसी प्रकार ब्रह्ममे भोक्तापन आनेकी आशङ्का नहीं है तथा जीवात्मा और परमात्माके परस्पर विभाग होनेमे भी कोई अड़चन नहीं है। इसके - सिवा, जैसे एक ही पितासे उत्पन्न बहुत-से लड़के परस्पर एक-दूसरेके सुख-दुःखके भोक्ता नहीं होते, इसी प्रकार भिन्न-भिन्न जीवोंको कर्मानुसार जो सुख-दुःख प्राप्त होते हैं, उनका उपभोग वे पृथक्-पृथक् ही करते हैं, एक दूसरेके नहीं। इसी तरह यह भी देखा जाता है कि एक ही पृथिवी-तत्त्वके नाना प्रकारके कार्य घट, पट, कपाट आदिमे परस्पर भेदकी उपलब्धि अनायास हो रही है, उसमे कोई बाधा नहीं आती। घड़ा वस्त्र या कपाट नहीं बनता और वस्त्र घड़ा नहीं बनता और कपाट वस्त्र नहीं बनता। सबके अलग-अलग नाम, रूप और व्यवहार चलते रहते है। उसी प्रकार एक ही ब्रह्मके असंख्य कार्य होनेपर भी उनके विभागमे किसी प्रकारकी बाधा नहीं आती है। सम्बन्ध—ऐसा माननेसे कारण और कार्यमें अनन्यता सिद्ध नही होगी, ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं— तदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः ॥ २ । १ । १४ ॥ आरम्भणशब्दादिभ्यः = आरम्भण शब्द आदि हेतुओसे; तदनन्यत्वम् = उसकी अर्थात् कार्यकी कारणसे अनन्यता सिद्ध होती है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्में यह कहा गया है कि 'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद् वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्।' (छा० उ० ६ । १ । ४) अर्थात् 'हे सोम्य ! जैसे मिट्टीके एक ढेलेका तत्त्व जान लेनेपर मिट्टीसे उत्पन्न होनेवाले समस्त कार्य जाने हुए हो जाते हैं; उनके नाम और आकृतिके भेद तो व्यवहारके लिये है, वाणीसे उनका कथनमात्र