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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ तु=तथा; तत्=वह ब्रह्म; समन्वयात्=समस्त जगत्में पूर्णरूपसे अनुगत (व्यास) होनेके कारण (उपादान भी है)। व्याख्या—जिस प्रकार अनुमान और शास्त्र-प्रमाणसे यह सिद्ध होता है कि इस विचित्र जगत्‌का निमित्त कारण परब्रह्म परमेश्वर है, उसी प्रकार यह भी सिद्ध है कि वही इसका उपादान कारण भी है; क्योंकि वह इस जगत्‌मे पूर्णतया अनुगत (व्यास) है, इसका अणुमात्र भी परमेश्वरसे शून्य नहीं है। श्रीमद्भगवद्गीतामे भी भगवान्‌ने कहा है कि 'चर या अचर, जड या चेतन, ऐसा कोई भी प्राणी या भूतसमुदाय नहीं है, जो मुझसे रहित हो।' (१० । ३९) 'यह सम्पूर्ण जगत् मुझसे व्याप्त है।' (गीता ९ । ४) उपनिषदोंमें भी स्थान-स्थानपर यह बात दुहरायी गयी है कि 'उस परब्रह्म परमेश्वरसे यह समस्त जगत् व्याप्त है।'* सम्बन्ध—सांख्यमतके अनुसार त्रिगुणात्मिका प्रकृति भी समस्त जगत्में व्याप्त है, फिर व्याप्तिरूप हेतुसे जगत्‌का उपादान कारण ब्रह्मको ही क्यों मानना चाहिये, प्रकृतिको क्यों नहीं ? इसपर कहते हैं— ईक्षतेर्नाशब्दम् ॥ १ । १ । ५ ॥ ईक्षतेः=श्रुतिमे 'ईक्ष' धातुका प्रयोग होनेके कारण; अशब्दम्=शब्द- प्रमाण-शून्य प्रधान-(त्रिगुणात्मिका जड प्रकृति); न=जगत्‌का कारण नहीं है। व्याख्या—उपनिषदोंमे जहाँ सृष्टिका प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'ईक्ष' धातुकी क्रियाका प्रयोग हुआ है; जैसे 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० उ० ६ । २ । १) इस प्रकार प्रकरण आरम्भ करके 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजा- येय' (छा० उ० ६ । २ । ३) अर्थात् 'उस सत्‌ने ईक्षण—सङ्कल्प किया कि मै बहुत हो जाऊँ, अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ।' ऐसा कहा गया है। इसी प्रकार दूसरी जगह भी 'आत्मा वा इदमेकमेवाग्र आसीत्' इस प्रकार आरम्भ करके 'स ईक्षत लोकान्नु सृजै' (ऐ० उ० १ । १ । १) अर्थात् उसने ईक्षण—विचार किया कि निश्चय ही मै लोकोंकी रचना करूँ।' ऐसा कहा है। परन्तु त्रिगुणात्मिका प्रकृति जड है, उसमे ईक्षण या सङ्कल्प नहीं

  • ईशावास्यमिदँ सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । ( ईशा० १ )