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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ३६—३९ ] अध्याय ३ २५३ है और इस प्रकार अभिन्न होते हुए भी उनके नियन्ता होनेके कारण वे उनसे सर्वथा विलक्षण एवं उत्तम भी हैं। सम्बन्ध—इस तरह उस ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करके अब इस बातका निर्णय करनेके लिये कि जीवोंके कर्मोंका यथायोग्य फल देनेवाला कौन है, अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— फलमत उपपत्तेः ॥ ३ । २ । ३८ ॥ फलम्=जीवोंके कर्मोंका फल; अतः=इस परब्रह्मसे ही होता है; उपपत्तेः= क्योंकि ऐसा मानना ही युक्तिसङ्गत है। व्याख्या—जो सर्वशक्तिमान् और सबके कर्मोंको जाननेवाला हो, वही जीवो- द्वारा किये हुए कर्मोंका यथायोग्य फल प्रदान कर सकता है। उसके सिवा, न तो जड प्रकृति ही कर्मोंको जानने और उनके फलकी व्यवस्था करनेमें समर्थ है और न स्वयं जीवात्मा ही; क्योंकि वह अल्पज्ञ और अल्प शक्तिवाला है। कहीं-कहीं जो देवता आदिको कर्मोंका फल देनेवाला कहा गया है, वह भी भगवान्‌के विधानको लेकर कहा गया है, भगवान् ही उनको निमित्त बनाकर वह फल देते हैं (गीता ७ । २२)। इस न्यायसे यही सिद्ध हुआ कि जीवोंके कर्मफल-भोगकी व्यवस्था करनेवाला वह परमात्मा ही है, दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध—केवल युक्तिसे ही यह बात सिद्ध होती है, ऐसा नहीं; किन्तु— श्रुतत्वाच्च ॥ ३ । २ । ३९ ॥ श्रुतत्वात्=श्रुतिमे ऐसा ही कहा गया है, इसलिये; च=भी (यही मानना ठीक है कि कर्मोंका फल परमात्मासे ही प्राप्त होता है)। व्याख्या—वह परमेश्वर ही कर्मफलको देनेवाला है, इसका वर्णन वेदमें इस प्रकार आता है—'य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ (क० उ० २ । २ । ८) 'जो यह जीवोके कर्मा- नुसार नाना प्रकारके भोगोका निर्माण करनेवाला परम पुरुष परमेश्वर प्रलयकालमें सबके सो जानेपर भी जागता रहता है, वही परम विशुद्ध है, वही ब्रह्म है और उसीको अमृत कहते है।' तथा श्वेताश्वतरमे भी इस प्रकार वर्णन आया है— 'नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूना यो विदधाति कामान्' (श्वे० उ० ६ । १३)—'जो एक नित्य चेतन परमात्मा बहुतसे नित्य चेतन आत्माओंके कर्मफल-