ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ७—१० ] अध्याय ३ २६१ संज्ञातश्चेत्तदुक्तमस्ति तु तदपि ॥ ३ । ३ । ८ ॥ चेत् = यदि कहो कि; संज्ञातः = संज्ञासे परस्पर-भेद होनेके कारण (एकता सिद्ध नहीं हो सकती) तो; तदुक्तम् = उसका उत्तर (सूत्र ३।३।१ मे) दे चुके हैं; तु = तथा; तदपि = वह (संज्ञाभेदके कारण होनेवाली विद्याविषयक विषमता) भी; अस्ति = अन्यत्र है। व्याख्या—यदि कहो कि उसमे संज्ञाका अर्थात् नामका भेद है; उस विद्या- का नाम दहरविद्या है और दूसरीका नाम प्राजापत्य-विद्या है, इसलिये दोनोंकी एकता नहीं हो सकती तो इसका उत्तर हम पहले (सूत्र ३।३।१ मे) ही दे चुके हैं। वहाँ बता आये है कि समस्त उपनिषदोंमे भिन्न-भिन्न नामोसे जिन ब्रह्मविद्याओका वर्णन है, उन सबमे विधिवाक्य, फल और उद्देश्य-विधेय आदिकी एकता होनेसे सब ब्रह्मविद्याओकी एकता है। इसलिये यहाँ संज्ञा-भेदसे कोई विरोध नहीं है। इसके सिवा, जिनमे उद्देश्य, विधेय और फल आदिकी समानता नहीं है, उन विद्याओमे संज्ञा आदिके कारण भेद होता है और वैसी विद्याओका वर्णन भी उपनिषदोंमे है ही (छा० उ० ३।१८।१ तथा ३।१९।१)। सम्बन्ध—नामका भेद होनेपर भी विद्यामें एकता हो सकती है, इस बातको सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— व्याप्तेश्च समञ्जसम् ॥ ३ । ३ । ९ ॥ व्याप्तेः = ब्रह्म सर्वत्र व्याप्त है, इस कारण; च = भी; समञ्जसम् = ब्रह्मविद्याओ- मे समानता है। व्याख्या—परब्रह्म परमात्मा सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है, इसलिये ब्रह्मविषयक विद्याके भिन्न-भिन्न नाम और प्रकरण होनेपर भी उनकी एकता होना उचित है, क्योंकि उन ब्रह्मविषयक सभी विद्याओंका उद्देश्य एकमात्र परब्रह्म परमात्माके ही स्वरूपका नाना प्रकारसे प्रतिपादन करना है। सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि विद्याओंकी एकता और भिन्नता- का निर्णय करनेके लिये प्रकरण, संज्ञा और वर्णनकी एकता और भेदकी अपेक्षा है या नहीं? इसपर कहते हैं— सर्वाभेदादन्यत्रेमे ॥ ३ । ३ । १० ॥