ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र ११-१३] अध्याय ३ २६३ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिरुपचयापचयौ हि भेदे ॥ ३ । ३ । १२ ॥ प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः= 'प्रियशिरस्त्व'—'प्रियरूप सिरका होना' आदि धर्मोंकी प्राप्ति अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रकरणमे नहीं होती है; हि=क्योकि; भेदे=इस प्रकार सिर आदि अङ्गोका भेद मान लेनेपर; उपचयापचयौ=ब्रह्ममे बढ़ने-घटने- का दोष उपस्थित होगा । व्याख्या—प्रिय उसका सिर है, मोद और प्रमोद पाँख है, इस प्रकार पक्षी- का रूपक देकर जो अङ्गोकी कल्पना की गयी है, यह ब्रह्मका स्वरूपगत धर्म नहीं है; अतः इसका संग्रह दूसरी जगह ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे करना उचित नहीं है; क्योकि इस प्रकार अङ्ग-प्रत्यङ्गके भेदसे ब्रह्ममे भेद मान लेनेपर उसमे बढ़ने-घटने- के दोषकी आशङ्का होगी; इसलिये जो ब्रह्मके स्वाभाविक लक्षण न हो, किसी रूपकके उद्देश्यसे कहे गये हो, उनको दूसरी जगह नहीं लेना चाहिये । सम्बन्ध—उसमें जो आनन्द और ब्रह्म शब्द आये हैं, उनको दूसरी जगह लेना चाहिये या नहीं ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— इतरे त्वर्थसामान्यात् ॥ ३ । ३ । १३ ॥ तु=किन्तु; इतरे=दूसरे जो आनन्द आदि धर्म हैं वे (ब्रह्मके स्वरूपका प्रतिपादन करनेके लिये श्रुतिमें कहे गये हैं, इसलिये अन्यत्र ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमें उनका ग्रहण किया जा सकता है); अर्थसामान्यात्=क्योंकि उन सब स्थलोंमे अर्थकी समानता है । व्याख्या—रूपकके लिये अवयवकी कल्पनासे युक्त जो प्रियशिरस्त्व आदि धर्म हैं, उनको छोड़कर दूसरे-दूसरे जो आनन्द आदि स्वरूपगत धर्म हैं, उनका संग्रह प्रत्येक ब्रह्मविद्याके प्रसङ्गमे किया जा सकता है; क्योकि उनमे अर्थकी समानता है अर्थात् उन सबके द्वारा प्रतिपाद्य ब्रह्म एक ही है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में जो रथके रूपककी कल्पना करके इन्द्रिय आदिका घोड़े आदिके रूपमें वर्णन किया है, वहाँ तो इन्द्रिय आदि- के संयमकी बात समझानेके लिये वैसा कहना सार्थक मालूम होता है, परन्तु यहाँ तो पक्षीके रूपकका कोई विशेष प्रयोजन नही दीखता । अतः यहाँ इस रूपककी कल्पना किसलिये की गयी ? इस जिज्ञासापर कहते हैं—