ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in context२६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ भेद है या अभेद ? यह संशय उपस्थित होनेपर सूत्रकार कहते हैं—जैसे भिन्न शाखाओंमें विद्याकी एकता और गुणोंका उपसंहार उचित माना गया है, उसी प्रकार एक शाखामें कही हुई विद्याओंमें भी एकता माननी चाहिये; क्योंकि वहाँ उपास्यमें भेद नहीं है। दोनों जगह एक ही ब्रह्म उपास्य बताया गया है। सम्बन्ध—उपास्यके सम्बन्धको लेकर किस जगह विद्याकी एकता माननी चाहिये और किस जगह नहीं ? इसका निर्णय करनेके लिये पूर्वपक्ष उपस्थित किया जाता है— सम्बन्धादेवमन्यत्रापि ॥ ३ । ३ । २० ॥ एवम्=इस प्रकार; सम्बन्धात्=उपास्यके सम्बन्धसे; अन्यत्र=दूसरी जगह; अपि=भी ( क्या विद्याकी एकता मान लेनी चाहिये ? ) । व्याख्या—इसी प्रकार एक ही उपास्यका सम्बन्ध बृहदारण्यकमें देखा जाता है। वहाँ पहले कहा गया है कि सत्य ही ब्रह्म है. इत्यादि ( बृह० उ० ५ । ५ । १ ); फिर इसी सत्यकी सूर्यमण्डलमें स्थित पुरुषके साथ और आँखमें स्थित पुरुषके साथ एकता की गयी है ( बृह० उ० ५ । ५ । २ )। उसके बाद दोनोंका रहस्यमय नाम क्रमशः 'अहर' और 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकरण- में एक ही उपास्यका सम्बन्ध होनेपर भी स्थान-भेदसे पृथक्-पृथक् दो उपासनाएँ बतायी गयी हैं, अतः इनमें भेद मानना चाहिये या अभेद ? सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें उठायी हुई शङ्काका उत्तर अगले सूत्रमें देते हैं— न वा विशेषात् ॥ ३ । ३ । २१ ॥ न वा=इन दोनोंकी एकता नहीं माननी चाहिये; विशेषात्=क्योंकि इन दोनों पुरुषोंके रहस्यमय नाम और स्थानमें भेद किया गया है। व्याख्या—इन दोनों उपासनाओंके वर्णनमें स्थान और नाम भिन्न-भिन्न बताये गये हैं। सूर्यमण्डलमें स्थित सत्यपुरुषका तो रहस्यमय नाम 'अहर' कहा है और आँखमें स्थित पुरुषका रहस्यमय नाम 'अहम्' बतलाया है। इस प्रकार नाम और स्थानका भेद होनेके कारण इन उपासनाओंकी एकता नहीं मानी जा सकती; अतएव एकके नाम और गुणका उपसंहार दूसरे पुरुषमें नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—इस बातको श्रुतिप्रमाणसे स्पष्ट करते हैं—