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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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२७४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ नियम पूर्वकथित वाक्यका शेष होकर सबको मान्य होता है। तथा एक शाखावाले स्तुतिगानके विषयमें समानभावसे कहते हैं कि 'ऋत्विज उपगायन्ति'—'ऋत्विज् लोग स्तोत्रका गान करें' किन्तु दूसरी शाखावाले यह विधान करते है कि 'नाध्वर्यु- रुपगायति'—'अध्वर्युको स्तोत्र-गान नहीं करना चाहिये।' अतः इसको भी वाक्य-शेष मानकर सब यह स्वीकार करते हैं कि 'अध्वर्युको छोड़कर अन्य ऋत्विजोद्वारा स्तोत्रोंका गान होना चाहिये।' उसी प्रकार जहाँ केवल पाप आदिके नाशकी ही बात कही है, ब्रह्मलोकादिकी प्राप्ति नहीं बतलायी गयी है, वहाँ प्राप्तिरूप फलको भी वाक्यशेषके रूपमें ग्रहण कर लेना चाहिये। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि 'देवयानमार्गसे ब्रह्मलोकमे जानेवाले महापुरुषके पापकर्म नष्ट हो जाते हैं, परन्तु पुण्य-कर्म तो शेष रहते ही होंगे; अन्यथा उसका ब्रह्मलोकमें गमन कैसे सम्भव होगा ? क्योंकि ऊपरके लोकोंमें जाना शुभ कर्मोंका ही फल है।' इसपर कहते हैं— साम्पराये तर्तव्याभावात्तथा ह्यन्ये ॥ ३ । ३ । २७ ॥ साम्पराये=ज्ञानीके लिये परलोकमे; तर्तव्याभावात्=भोगके द्वारा पार करने योग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता, इस कारण (उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते हैं); हि=क्योंकि; तथा=यही बात; अन्ये=अन्य शाखावाले कहते हैं। व्याख्या—बृहदारण्यकोपनिषद्मे यह बात स्पष्ट शब्दोंमें बतायी गयी है कि 'उभे उ हैवौष एते तरति।' (४। ४। २२) अर्थात् 'यह ज्ञानी निश्चय ही पुण्य और पाप दोनोंको यहीं पार कर जाता है।' इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञानी पुरुषका शरीर त्याग देनेके बाद शुभाशुभ कर्मोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उसे जो ब्रह्मलोक (नित्य धाम) प्राप्त होता है, वह किसी कर्मके फलरूपमें नहीं, अपितु ब्रह्मज्ञानके बलसे प्राप्त होता है। अतः उसके लिये परलोकमें जाकर भोगद्वारा पार करनेयोग्य कोई कर्मफल शेष नहीं रहता; इसलिये उसके पुण्यकर्म भी यहीं समाप्त हो जाते है। ज्ञानीके सञ्चित आदि समस्त कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाता है, इस बातका समर्थन मुण्डकोपनिषद्मे भी इस प्रकार किया गया है—'तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्य-