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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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(क० उ० २ । ३ । १४, १५), कहीं ब्रह्मलोकमे जानेपर बतायी है (मु० उ० ३ । २ । ६) । अतः यदि उपर्युक्त दोनों प्रकारसे उसकी व्यवस्था नहीं मानी जायगी तो दोनों प्रकारका वर्णन करनेवाली श्रुतियोंमें विरोध आयेगा। इसलिये यही मानना ठीक है कि साधकके संकल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। ऐसा माननेपर ही देवयान-मार्गसे गतिका वर्णन करनेवाली श्रुतिकी सार्थकता होगी और श्रुतियोंका परस्पर विरोध भी दूर हो जायगा। सम्बन्ध-पुनः उसी बातको सिद्ध करते हैं- उपपन्नस्तल्लक्षणार्थोपलब्धेलोकवत् ॥ ३ । ३ । ३० ॥ तल्लक्षणार्थोपलब्धेः = उस देवयानमार्गद्वारा ब्रह्मलोकमें जानेके उपयुक्त सूक्ष्म शरीरादि उपकरणोंकी प्राप्तिका कथन होनेसे; उपपन्नः = उनके लिये ब्रह्मलोकमे जानेका कथन युक्तिसङ्गत है; लोकवत् = लोकमे भी ऐसा देखा जाता है। व्याख्या-श्रुतिमें जहाँ साधकके लिये देवयानमार्गके द्वारा ब्रह्मलोकमें जानेकी बात कही है, उस प्रकरणमें उसके उपयोगी उपकरणोंका वर्णन भी पाया जाता है। श्रुतिमे कहा है कि यह जीवात्मा जिस सङ्कल्पवाला होता है, उस सङ्कल्पद्वारा मुख्य प्राणमे स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण उदानवायुमे स्थित हो मन-इन्द्रियोंसे युक्त जीवात्माको उसके सङ्कल्पानुसार लोकमें जाता है। (प्र० उ० ३ । १०) इसी तरह दूसरी जगह अर्चि-अभिमानी देवतादिको प्राप्त होना कहा है। (छा० उ० ५ । १० । १, २) इस प्रकार समस्त कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जानेपर भी उसका दिव्य-शरीरसे सम्पन्न होना बतलाया गया है; किन्तु जिन साधकोंको शरीर रहते हुए परब्रह्म परमेश्वर प्रत्यक्ष हो जाते हैं, उनके लिये वैसा वर्णन नहीं आता (क० उ० २ । ३ । १४); अपितु उनके विषयमें श्रुतिने इस प्रकार कहा है कि-'योऽकामो निष्काम आप्तकाम आत्म- कामो न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति।' (बृह० उ० ४ । ४ । ६) अर्थात् 'जो कामनारहित, निष्काम, पूर्णकाम तथा केवल परमात्मा- को ही चाहनेवाला है, उसके प्राण ऊपरके लोकोंमें नहीं जाते। वह ब्रह्म होकर ही (यहाँ) ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' इसलिये यही मानना सुसंगत है कि साधकके सङ्कल्पानुसार दोनों प्रकारसे ही ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। लोकमें भी देखा जाता है कि जिसको अपने स्थानसे कहीं अन्यत्र जाना होता है, उसके