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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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२९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ 'उनकी पंद्रह कलाएँ अर्थात् प्राणोंके सहित सब इन्द्रियाँ अपने-अपने देवताओमे विलीन हो जाती है, जीवात्मा और उसके समस्त कर्मसंस्कार- ये सब-के-सब परम अविनाशी परमात्मामे एक हो जाते है।' ( ३ । २ । ७ )। फिर नदी और समुद्रका दृष्टान्त देकर बताया है कि 'तथा विद्वांनामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ।'-'वह ब्रह्मको जाननेवाला विद्वान् नाम-रूपको यहीं छोड़कर परात्पर ब्रह्ममें विलीन हो जाता है।' ( ३ । २ । ८ ) । इस प्रकार शुद्ध अन्तःकरणवाले अधिकारियोके लिये ब्रह्मलोककी प्राप्ति बतानेके बाद साक्षात् ब्रह्मको जान लेनेवाले विद्वान्‌का यहीं नाम-रूपसे मुक्त होकर परब्रह्ममे विलीन हो जाना सूचित करनेवाले शब्दसमुदाय पूर्वसूत्रमे कही हुई बातको स्पष्ट करते है । इसलिये यह सिद्ध होता है कि जिनके अन्तःकरणमे ब्रह्मलोकके महत्त्वका भाव है, वहाँ जानेके सङ्कल्पसे जिनका सूक्ष्म और कारण-शरीरसे सम्बन्ध-विच्छेद नहीं हुआ, ऐसे ही साधक ब्रह्मलोकोंमें जाते हैं। जिनको यहीं ब्रह्मसाक्षात्कार हो जाता है, वे नहीं जाते । यह अवान्तर फल-भेद होना उचित ही है। सम्बन्ध-यहाँतक मुक्तिविषयक फलभेदके प्रकरणको समाप्त करके अब शरीरपातके बाद आत्माकी सत्ता और कर्मफलका भोग न माननेवाले नास्तिकोंके मतका खण्डन करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ करते हैं- एक आत्मनः शरीरे भावात् ॥ ३ । ३ । ५३ ॥ एके=कई एक कहते है कि; आत्मनः =आत्माका; शरीरे =शरीर होनेपर ही; भावात् =भाव होनेके कारण ( शरीरसे भिन्न आत्माकी सत्ता नहीं है )। व्याख्या-कई एक नास्तिकोका कहना है कि जबतक शरीर है, तभीतक इसमे चेतन आत्माकी प्रतीति होती है, शरीरके अभावमे आत्मा प्रत्यक्ष नहीं है । इससे यही सिद्ध होता है कि शरीरसे भिन्न आत्मा नहीं है, अतएव मरनेके बाद, आत्मा परलोकमे जाकर कर्मोंका फल भोगता है या ब्रह्मलोकमे जाकर मुक्त हो जाता है, ये सभी बातें असङ्गत हैं । सम्बन्ध-इसके उत्तरमें सूत्रकार कहते हैं-- व्यतिरेकस्तद्भावाभावित्वान्न तूपलब्धिवत् ॥ ३ । ३ । ५४ ॥ व्यतिरेकः =शरीरसे आत्मा भिन्न है; तद्भावाभावित्वात् =क्योंकि शरीर रहते हुए भी उसमे आत्मा नहीं रहता, इसलिये; न =आत्मा शरीर नहीं है;