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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है। इसलिये भी 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है। सम्बन्ध-आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही; अतः 'आनन्दमय' शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १ । १ । १८ ॥ च=तथा; कामात्=( 'आनन्दमय'मे ) कामनाका कथन होनेसे; अनुमाना- पेक्षा=(यहाँ ) अनुमान-कल्पित जड प्रकृतिको 'आनन्दमय' शब्दसे ग्रहण करने- की आवश्यकता; न=नहीं है। व्याख्या—उपनिषद्मे जहाँ 'आनन्दमय'का प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'सोऽकाम- यत' इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमे सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि जड प्रकृतिके लिये असम्भव है। अतः उस प्रकरणमें वर्णित 'आनन्द मय' शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता। सम्बन्ध—परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्द- मय' शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं— अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ । १ । १९ ॥ च=इसके सिवा; अस्मिन्=इस प्रकरणमे ( श्रुति ); अस्य=इस जीवात्माका; तद्योगम्=उस आनन्दमयसे संयुक्त होना ( मिल जाना ); शास्ति=बतलाती है ( इसलिये जड तत्त्व या जीवात्मा आनन्दमय नहीं है ) । व्याख्या—तै० उ० ( २ । ८ ) मे श्रुति कहती है कि 'इस आनन्दमय परमात्माके तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' बृहदारण्यकमे भी श्रुतिका कथन है कि '(ब्रह्मको जाननेवाला पुरुष ) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममे लीन होता है' ( बृह० उ० ४ । ४ । ६)। श्रुतिके इन वचनोसे यह स्वत सिद्ध हो जाता है' कि जड प्रकृति या जीवात्माको 'आनन्दमय' नहीं माना जा सकता; क्योकि चेतन जीवात्मा-