ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र १३—१७] अध्याय ३ ३०९ च = इसके सिवा; एके = कई एक विद्वान्; कामकारेण = स्वेच्छापूर्वक (कर्मोंका त्याग कर देते हैं, इसलिये भी विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है)। व्याख्या-श्रुति कहती है कि 'किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः ।'—'हम प्रजासे क्या प्रयोजन सिद्ध करेंगे, जिनका यह परब्रह्म परमेश्वर ही लोक अर्थात् निवासस्थान है।' (बृह० उ० ४ । ४ । २२) इत्यादि श्रुतियो- में कितने ही विद्वानोंका स्वेच्छापूर्वक गृहस्थ आश्रम और कर्मोंका त्याग करना बतलाया गया है। यदि 'कुर्वन्नेवेह' इत्यादि श्रुति सभी विद्वानोंके लिये कर्मका विधान करनेवाली मान ली जाय तो इस श्रुतिसे विरोध आयेगा। अतः यही समझना चाहिये कि विद्वानोमे कोई अपनी पूर्वप्रकृतिके अनुसार आजीवन कर्म करता रहता है और कोई छोड़ देता है, इसमे उनकी स्वतन्त्रता है। इसलिये भी यह सिद्ध नहीं होता कि विद्या कर्मका अङ्ग है। सम्बन्ध-प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— उपमर्दं च ॥ ३ । ४ । १६ ॥ च=इसके सिवा; उपमर्दम्=ब्रह्मविद्यासे कर्मोंका सर्वथा नाश हो जाना कहा है (इससे भी पूर्वोक्त बात सिद्ध होती है)। व्याख्या-'उस परमात्माका ज्ञान हो जानेपर इसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते है' (मु० उ० २ । २ । ८) इत्यादि श्रुतियोंमें तथा स्मृतिमें भी ज्ञानका फल समस्त कर्मोंका भलीभाँति नाश बतलाया है (गीता ४ । ३७)*। इसलिये ब्रह्मविद्या- को कर्मका अङ्ग नहीं माना जा सकता; तथा केवल ब्रह्मविद्यासे परमात्माकी प्राप्तिरूप परमपुरुषार्थकी सिद्धि नहीं होती, यह कहना भी नहीं बन सकता। सम्बन्ध-पुनः दूसरे प्रमाणसे सिद्धान्तकी पुष्टि करके यहाँतक जैमिनिद्वारा उपस्थित की हुई सब शङ्काओंका उत्तर देकर 'विद्या कर्मका अङ्ग नहीं है, स्वतन्त्र साधन है।' इस बातकी पुनः पुष्टि करते हैं— ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि ॥ ३ । ४ । १७ ॥
- यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ॥ 'हे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित आग लकड़ियोंको भस्म कर डालती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मोंको भस्म कर देती है।'