BharatKosha
ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

Page 333 of 417

Read in context
Page 333

३१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी सिद्धान्तको दृढ़ करते हैं— विधिर्वा धारणवत् ॥ ३ । ४ । २० ॥ वा=अथवा; विधिः=उक्त मन्त्रमें अन्य आश्रमोंकी विधि ही माननी चाहिये, अनुवाद नहीं; धारणवत्=जैसे समिधा-धारण-सम्बन्धी वाक्यमे 'ऊपर धारण' की क्रियाको अनुवाद न मानकर विधि ही माना गया है । व्याख्या—जैसे 'अधस्तात् समिधं धारयन्ननुद्रवेदुपरि हि देवेभ्यो धारयति ।' अर्थात् 'स्रुग्दण्डके नीचे समिधा-धारण करके अनुद्रवण करे, किन्तु देवताओंके लिये ऊपर धारण करे।' इस वाक्यमे स्रुग्दण्डके अधोभागमे समिधा-धारणकी विधिके साथ एकवाक्यताकी प्रतीति होनेपर भी 'ऊपर धारण' की क्रियाको अपूर्व होनेके कारण विधि मान लिया गया है । उसी प्रकार पूर्वोक्त श्रुतिमे जो चारो आश्रमोंका सांकेतिक वर्णन है, उसे अनुवाद न मानकर विधि ही स्वीकार करना चाहिये । दूसरी श्रुतिमे आश्रमोंका विधान करनेवाले वचन स्पष्ट मिलते है । यथा—'ब्रह्मचर्यं परिसमाप्य गृही भवेद् गृही भूत्वा वनी भवेद् वनी भूत्वा प्रव्रजेत् । यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद् गृहाद् वा वनाद् वा ।....यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् ।' (जाबा० उ० ४) अर्थात् 'ब्रह्मचर्यको पूर्ण करके गृहस्थ होना चाहिये । गृहस्थसे वानप्रस्थ होकर उसके बाद संन्यासी होना उचित है । अथवा तीव्र इच्छा हो तो दूसरे प्रकारसे—ब्रह्मचर्यसे, गृहस्थसे या वानप्रस्थसे संन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये । जिस दिन पूर्ण वैराग्य हो जाय, उसी दिन संन्यास ले लेना चाहिये ।' इसी प्रकार अन्यान्य श्रुतियोंमे भी आश्रमोंके लिये विधि देखी जाती है । अतः जहाँ केवल सांकेतिकरूपसे आश्रमोंका वर्णन हो, वहाँ संकेतसे ही उनकी विधि भी मान लेनी चाहिये । यहाँ यह बात भी ध्यानमें रखनी चाहिये कि कर्मत्यागका निषेध करनेवाली जो श्रुति है, वह कर्मासक्त मनुष्योंके लिये ही है; विरक्तके लिये नहीं है । इस विवेचनसे यह सिद्ध हो गया कि कर्मों- के बिना केवल ज्ञानसे ही ब्रह्मप्राप्तिरूप परम पुरुषार्थकी सिद्धि होती है । सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें संन्यास-आश्रमकी सिद्धि की गयी । अब यज्ञकर्मके अङ्गभूत उद्गीथ आदिमें की जानेवाली जो उपासना है, उसकी तथा उसके लिये बताये हुए गुणोंकी विधेयता सिद्ध करके विद्या कर्मोंका अङ्ग नहीं है यह सिद्ध करनेके उद्देश्यसे अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है—