ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)
Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press
by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य
Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)
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Read in contextसूत्र २८—२९ ] अध्याय ३ ३१९ है, इसे मैंने पात्रमे रखकर खाना आरम्भ कर दिया है, यह जूठा अन्न आपको कैसे दूँ ?' उषस्ति बोले—'इन्हींमेसे मुझे दे दो।' महावतने वे उड़द उनको दे दिये और कहा 'यह जल भी प्रस्तुत है, पी लीजिये।' उषस्तिने कहा—'नहीं, यह जूठा है, इससे जूठा पानी पीनेका दोष लगेगा।' यह सुनकर महावत बोला— 'क्या ये उड़द जूठे नहीं थे?' उषस्तिने कहा—'इनको न खानेसे तो मेरा जीना असम्भव था, किन्तु जल तो मुझे अन्यत्र भी इच्छानुसार मिल सकता है।' इत्यादि (छा० उ० १ । १० । १ से ७ तक)। श्रुतिमे कही हुई इस कथाको देखनेसे यह सिद्ध होता है कि जिस समय अन्नके बिना मनुष्य जीवन धारण करनेमे असमर्थ हो जाय, प्राण बचनेकी आशा न रहे, ऐसी परिस्थितिमे ही अपवित्र या उच्छिष्ट अन्न भक्षण करनेके लिये शास्त्रकी सम्मति है, साधारण अवस्थामे नहीं; क्योकि उड़द खानेके बाद उषस्तिने जल-ग्रहण न करके इस बातको भली प्रकार स्पष्ट कर दिया है। अतएव वहाँ जो यह कहा है कि 'इस रहस्यको जाननेवालेके लिये कोई अभक्ष्य नहीं होता, उसका अभिप्राय प्राणविद्या- के ज्ञानकी स्तुति करनेमे है, न कि अभक्ष्य-भक्षणके विधानमे; क्योकि वैसा कहनेपर अभक्ष्यका निषेध करनेवाले शास्त्र-वचनोसे विरोध होगा। इसलिये साधारण परिस्थितिमें मनुष्यको अपने आचार तथा आहारकी पवित्रताके संरक्षण- सम्बन्धी नियमका त्याग कदापि नहीं करना चाहिये। सम्बन्ध—दूसरी युक्तिसे पुनः इसी बातको पुष्ट करते हैं— अबाधाच्च ॥ ३ । ४ । २९ ॥ अबाधात्=अन्य श्रुतिका बाध नहीं होना चाहिये, इस कारणसे, च=भी (यही सिद्ध होता है कि आपत्कालके सिवा, अन्य परिस्थितिमे आचारका त्याग नहीं करना चाहिये)। व्याख्या—'आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः'—आहारकी शुद्धिसे अन्तःकरणकी शुद्धि होती है (छा० उ० ७। २६। २), इत्यादि जो भक्ष्याभक्ष्यका विचार करने- वाले शास्त्र-वचन हैं, उनके साथ एकवाक्यता करनेके लिये उनका दूसरी श्रुतिके द्वारा बाध (विरोध) होना उचित नहीं है। इस कारणसे भी आपत्तिकालके सिवा, साधारण अवस्थामे भक्ष्याभक्ष्य-विचार एवं अभक्ष्यके त्यागरूप आचारका त्याग नहीं करना चाहिये।