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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

by महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य

Source: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished417 pages

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सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९ होत्रं मिथुनमपश्यत् । तदुदिते सूर्येऽजुहोत् ।' (तै० ब्रा० २ । १ । २ । ८ ) तथा 'देवा वै सत्रमासत ।' ( तै० सं० २ । ३ । ३ ) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ' उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे देवताओका अधिकार बतानेवाले वचन ये है—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ।' ( बृह० १ । ४ । १० ) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह ब्रह्म हो गया।' इत्यादि । इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्मे ( ८ । ७ । २ से ८ । १२ । ६ तक ) यह प्रसङ्ग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामे रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामे अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है ? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १ । ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात् = उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर; अस्य= इस राजा जानश्रुतिके मनमे; शुक् = शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात् = (जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था ) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्या-प्राप्तिके लिये दौड़ा गया; ( इस कारण उस रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा ) हि=क्योकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता ) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमे रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर संबोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपि तु वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्रं कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। १- शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।