बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 1304 of 1402
Read in context| १२८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ६ |
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| सा स्थितिर्मयापि रक्षणीया यदि शक्यते; इत्युक्तं दैवेषु गौतम तद् वरेषु मानुषाणां ब्रूहीति न पुनस्तवादेयो वर इति। इतः परं न शक्यते रक्षितुम्; तामपि विद्यामहं तुभ्यं वक्ष्यामि; को ह्यन्योऽपि हि यस्मादेवं ब्रुवन्तं त्वामर्हति प्रत्याख्यातुं न वक्ष्यामीति अहं पुनः कथं न वक्ष्ये तुभ्यमिति ॥ ८ ॥ | सके तो उस स्थितिकी रक्षा मुझे भी करनी चाहिये थी; इसीसे मैंने यह कहा था कि 'हे गौतम ! यह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मानुष वरोंमेंसे माँगो।' यह वर तुम्हारे लिये अदेय है—ऐसी बात नहीं है। अब आगे इसे छिपाना सम्भव नहीं है; मैं उस विद्याको भी तुम्हारे प्रति कहे देता हूँ क्योंकि इस प्रकार बोलनेवाले तुमको मेरे सिवा दूसरा भी ऐसा कौन है, जो 'मैं नहीं कहूँगा' ऐसा कहकर निषेध करनेमें समर्थ हो सके ? फिर भला मैं तुमसे वह विद्या क्यों न कहूँगा ?' ॥८॥ |
चतुर्थ प्रश्नका उत्तर—पञ्चाग्निविद्या
१—द्युलोकाग्नि
| असौ वै लोकोऽग्निर्गौतमेत्यादि चतुर्थः प्रश्नः प्राथम्येन निर्णीयते क्रमभङ्गस्त्वेतन्निर्णयायत्तत्वादितरप्रश्ननिर्णयस्य। | 'असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम' इत्यादि मन्त्रसे चौथे प्रश्नका पहले निर्णय किया जाता है। क्रमभंग तो इसलिये किया गया है कि इस प्रश्नके निर्णयके अधीन ही अन्य प्रश्नोंका निर्णय है। |
असौ वै लोकोऽग्निर्गौतम तस्यादित्य एव समिद्रश्मयो धूमोऽहरर्चिर्दिशोऽङ्गारा अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गास्तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति तस्या आहुत्यै सोमो राजा संभवति ॥ ६ ॥