बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 253 of 1402
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| ब्राह्मण ४] | शाङ्करभाष्यार्थ | २४७ |
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| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| उच्यते' इति वक्तुम्; यथाभूतार्थवादित्वाद्देवस्य । न त्वियं कल्पना युक्ता, ब्रह्मशब्दार्थविपरीतो ब्रह्मभावी पुरुषो ब्रह्मेत्युच्यत इति श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाया अन्याय्यत्वान्महत्तरे प्रयोजनान्तरेऽसति । | गया है', क्योंकि वेद यथार्थवादी है। अतः 'ब्रह्म' शब्दसे ब्रह्म शब्दके अर्थसे विपरीत ब्रह्म होनेवाला पुरुष कहा गया है—ऐसी कल्पना करनी उचित नहीं है, क्योंकि जबतक कोई दूसरा बहुत बड़ा प्रयोजन न हो, श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना अन्याय्य है। |
| [पारमार्थिकाब्रह्मत्वासर्वत्वयोर्निषेधः]<br>अविद्याकृतव्यतिरेकेणाब्रह्मत्वमसर्वत्वं च विद्यत एवेति चेन्न, तस्य ब्रह्मविद्यायापोहानुपपत्तेः । न हि क्वचित्साक्षाद्वस्तुधर्मस्यापोढ्री दृष्टा कर्त्री वा ब्रह्मविद्या। अविद्यायास्तु सर्वत्रैव निवर्तिका दृश्यते। तथेहाप्यब्रह्मत्वमसर्वत्वं चाविद्याकृतमेव निवर्त्यतां ब्रह्मविद्यया । न तु पारमार्थिकं वस्तु कर्तुं निवर्तयितुं वार्हति ब्रह्मविद्या । तस्माद्व्यर्थैव श्रुतहान्यश्रुतकल्पना । | यदि कहो कि अविद्याकृत नहीं, वस्तुतः अब्रह्मत्व और असर्वत्व है ही, तो ऐसा कहना उचित नहीं, क्योंकि उसकी ब्रह्मविद्याद्वारा निवृत्ति होनी असम्भव होगी । ब्रह्मविद्या साक्षाद्रूपसे किसी वस्तुके धर्मोंका लोप या प्रादुर्भाव करनेवाली कभी नहीं देखी गयी । किंतु वह अविद्याकी सर्वत्र ही निवृत्ति करनेवाली देखी जाती है । इसी प्रकार यहाँ भी जो अविद्याकृत अब्रह्मत्व और असर्वत्व है, उसकी ही ब्रह्मविद्यासे निवृत्ति होनी चाहिये । ब्रह्मविद्या पारमार्थिक वस्तुको पैदा करने या निवृत्त करनेमें तो समर्थ है नहीं । इसलिये श्रुत अर्थको छोड़ना और अश्रुतकी कल्पना करना व्यर्थ ही है । |
| ब्रह्मण्यविद्यानुपपत्तिरिति चेत्? | पूर्व०--किंतु ब्रह्ममें अविद्या होना तो असंगत है ? |