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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 353 of 1402

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Page 353

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४७


| प्राणापानयोः सन्धिवीर्यवत्कर्महेतुश्च; उदान उत्कर्षोर्ध्वगमनादिहेतुरापादतलमस्तकस्थान ऊर्ध्ववृत्तिः, समानः समं नयनाद् भुक्तस्य पीतस्य च कोष्ठस्थानोऽन्नपक्ता, अन इत्येषां वृत्तिविशेषाणां सामान्यभूता सामान्यदेहचेष्टाभिसम्बन्धिनी वृत्तिः; एवं यथोक्तं प्राणादिवृत्तिजातमेतत्सर्वं प्राण एव । | कर्मा व्यान है, यह प्राण और अपानकी सन्धि है तथा बलकी अपेक्षा रखनेवाले कर्मोंका कारण है, उदान—जो उत्कर्ष (पुष्टि) और ऊर्ध्वगमन (प्राणोत्क्रमण) आदिका हेतु है तथा जिसका पादतलसे लेकर मस्तकपर्यन्त स्थान एवं ऊपरकी ओर गति है वह उदान है, समान—खाये-पीये पदार्थोंका समीकरण करनेके कारण अन्नको पचानेवाला उदरस्थ वायु समान है, अन—यह इन विशेषवृत्तियोंकी सामान्यभूत तथा देहकी सामान्य चेष्टासे सम्बन्ध रखनेवाली वृत्ति है; इस प्रकार यह उपर्युक्त प्राणादि समस्त वृत्तिसमुदाय प्राण ही है। | | प्राण इति वृत्तिमानाध्यात्मिकोऽन उक्तः। कर्म चास्य वृत्तिभेदप्रदर्शनेनैव व्याख्यातम्। व्याख्यातान्याध्यात्मिकानि मनोवाक्प्राणाख्यान्यन्नानि। एतन्मय एतद्विकारः प्राजापत्यैरेतैर्वाङ्मनःप्राणैरारब्धः। कोऽसौ ? अयं कार्यकारणसङ्घात आत्मा पिण्ड आत्म- | 'प्राण' इस शब्दसे वृत्तिमान् आध्यात्मिक अन (वायु) कहा गया है। इसके कर्मकी व्याख्या तो इसके वृत्तिभेदके प्रदर्शनसे ही कर दी गयी। इस प्रकार मन, वाक् और प्राणसंज्ञक आध्यात्मिक अन्नोंकी व्याख्या की गयी। यह एतन्मय—इनका विकार अर्थात् इन प्राजापत्य वाक्, मन और प्राणोंसे आरब्ध है। यह कौन ? यह जो भूत और इन्द्रियोंका संघात आत्मा यानी पिण्ड है, |