बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 355 of 1402
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ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ३४९
तीनों वेद ये ही हैं। वाक् ही ऋग्वेद है, मन यजुर्वेद है और प्राण सामवेद है ॥ ५॥ देवता, पितृगण और मनुष्य ये ही हैं। वाक् ही देवता हैं, मन पितृगण हैं और प्राण मनुष्य हैं ॥ ६॥ पिता, माता और प्रजा ये ही हैं। मन ही पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है ॥ ७॥
| त्रयो वेदा इत्यादीनि वाक्यानि ऋज्वर्थानि ॥ ५-७ ॥ | 'त्रयो वेदाः' इत्यादि वाक्योंका अर्थ सरल है ॥ ५-७ ॥ |
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विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव यत्किञ्च विज्ञातं वाचस्तद्रूपं वाग्घि विज्ञाता वागेनं तद्भूत्वावति ॥ ८ ॥
विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। जो कुछ विज्ञात है वह वाक्का रूप है, वाक् ही विज्ञाता है, वाक् इस (अपने ज्ञाता) की विज्ञात होकर रक्षा करती है ॥ ८ ॥
| विज्ञातं विजिज्ञास्यमविज्ञातमेत एव। तत्र विशेषः—यत्किञ्च विज्ञातं विस्पष्टं ज्ञातं वाचस्तद्रूपम्। तत्र स्वयमेव हेतुमाह—वाग्घि विज्ञाता प्रकाशात्मकत्वात्। कथमविज्ञाता भवेद् यान्यानपि विज्ञापयति "वाचैव सम्राड्बन्धुः प्रज्ञायते" (४। १। २) इति हि वक्ष्यति। <br><br> वाग्विशेषविद इदं फलमुच्यते—वागेवैनं यथोक्तवाग्विभूति- | विज्ञात, विजिज्ञास्य और अविज्ञात ये ही हैं। उनका विशेष रूप इस प्रकार है—जो कुछ विज्ञात—विस्पष्टरूपसे ज्ञात है, वह वाक्का रूप है। उसमें श्रुति स्वयं ही हेतु बतलाती है—प्रकाशस्वरूप होनेके कारण वाक् ही विज्ञाता है। जो दूसरोंको विज्ञापित करती है, वह स्वयं किस प्रकार अविज्ञात हो सकती है। "हे सम्राट् ! वाणीसे ही बन्धुकी पहचान होती है" ऐसा आगे चलकर श्रुति कहेगी भी। <br><br> वाक्की विशेषताको जाननेवालेके लिये यह फल बतलाया जाता है—वाक् ही इसका—उपर्युक्त |
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