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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 360 of 1402

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३५४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| करणस्य आधारत्वेन व्यवस्थिता द्यौः, तावानसावादित्यो ज्योतीरूपं करणमाधेयम्। | रूप यानी करणके आधाररूपसे व्यवस्थित द्युलोक है। तथा उतना ही वह ज्योतीरूप-करण यानी आधेय आदित्य है। | | तावग्न्यादित्यो वाङ्मनसे आधिदैविके मातापितरौ, मिथुनं मैथुनमितरेतरसंसर्गं समैतां समगच्छेताम्। 'मनसा आदित्येन प्रसूतं पित्रा, वाचाग्निना मात्रा प्रकाशितं कर्म करिष्यामि' इति, अन्तरा रोदस्योः। ततस्तयोरेव सङ्गमनात्प्राणो वायुरजायत परिस्पन्दाय कर्मणे। | वे अग्नि और आदित्य अर्थात् आधिदैविक वाक् और मन माता-पिता हैं, वे दोनों मिथुन अर्थात् एक-दूसरेके साथ संसर्गको प्राप्त हुए। 'पितृस्थानीय आदित्यरूप मनसे प्रसूत और मातृस्थानीय अग्निरूप वाणीसे प्रकाशित कर्म करूँगा' ऐसे अभिप्रायसे पृथिवी और द्युलोकके बीच उन दोनोंका समागम हुआ। तब उन्हींके समागमसे परिस्पन्द (चेष्टा) रूप कर्मके लिये प्राण यानी वायु हुआ।¹ | | यो जातः स इन्द्रः परमेश्वरः, न केवलमिन्द्र एवासपत्नोऽविद्यमानः सपत्नो यस्य; कः पुनः सपत्नो नाम ? द्वितीयो वै प्रतिपक्षत्वेनोपगतः स द्वितीयः सपत्न | जो उत्पन्न हुआ वह इन्द्र—परमेश्वर था। वह केवल इन्द्र ही नहीं था, असपत्न अर्थात् जिसका कोई सपत्न न हो—ऐसा भी था। किंतु सपत्न किसे कहते हैं ? द्वितीय अर्थात् जो प्रतिपक्षभावको प्राप्त हो वह दूसरा व्यक्ति ही सपत्न कहलाता |


१. ऊपर 'मन यह इसका आत्मा है, वाक् जाया है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अध्यात्मरूपसे तथा 'मन पिता है, वाक् माता है और प्राण प्रजा है' इस प्रकार अधिभूतरूपसे प्राणको मन और वाक्‌की प्रजा बतलाया है। इसी प्रकार यहाँ अधिदैवरूपसे भी उसे उनकी प्रजा बतलानेके लिये यह सब कहा गया है।

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