बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 403 of 1402
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ब्राह्मण ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३९७
करता है। वह यह तीन होते हुए भी एक आत्मा है और आत्मा भी एक होते यह तीन है। वह यह अमृत सत्यसे आच्छादित है। प्राण ही अमृत है और नाम-रूप सत्य हैं, उनसे यह प्राण आच्छादित है॥ ३॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| अथेदानीं सर्वकर्मविशेषाणां मननदर्शनात्मकानां चलनात्मकानां च क्रियासामान्यमात्रेऽन्तर्भाव उच्यते। कथम् ? सर्वेषां कर्मविशेषाणामात्मा शरीरं सामान्यमात्मा, आत्मनः कर्म आत्मेत्युच्यते। 'आत्मना हि शरीरेण कर्म करोति' इत्युक्तम्। शरीरे च सर्वं कर्माभिव्यज्यते। अतः तात्स्थ्यात्तच्छब्दं कर्म—कर्मसामान्यमात्रं सर्वेषामुक्थमित्यादि पूर्ववत्। | अब इस समय मनन-दर्शनात्मक एवं चलनस्वरूप समस्त कर्मविशेषोंका क्रिया सामान्यमात्रमें अन्तर्भाव बतलाया जाता है। किस प्रकार ? समस्त कर्मविशेषोंका आत्मा-शरीर सामान्य आत्मा है, आत्माका कार्य होनेसे यहाँ कर्मको 'आत्मा' कहा है। ऊपर यह कहा जा चुका है कि 'आत्मा यानी शरीरसे [जीव] कर्म करता है।' शरीरमें ही समस्त कर्मोंकी अभिव्यक्ति होती है। अतः आत्मस्थ होनेके कारण कर्मको उसी शब्दसे कहा जाता है, वह कर्म-सामान्यमात्र (आत्मा) समस्त कर्मोंका उक्थ है—इत्यादि सब पूर्ववत् समझना चाहिये। |
| तदेतद्यथोक्तं नाम रूपं कर्म त्रयमितरेतराश्रयम्, इतरेतराभिव्यक्तिकारणम्, इतरेतरप्रलयं संहतं त्रिदण्डविष्टम्भवत् सदेकम्। केनात्मनैकत्वम् ? इत्युच्यते— | वे ये उपर्युक्त नाम, रूप और कर्म—तीनों एक दूसरेके आश्रित, एक-दूसरेकी अभिव्यक्तिके कारण, एक-दूसरेमें लीन होनेवाले और परस्पर मिले हुए तीन दण्डोंके समूह-के समान एक हैं। उनकी किस रूपसे एकता है, सो बतलायी जाती |