बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 406 of 1402
Read in contextद्वितीय अध्याय
प्रथम ब्राह्मण
उपक्रम
| आत्मेत्येवोपासीत, तदन्वेषणे च सर्वमन्विष्टं स्यात्; तदेव चात्मतत्त्वं सर्वस्मात्प्रेयस्त्वादन्वेष्टव्यम्। ‘आत्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि’ इत्यात्मतत्त्वमेकं विद्याविषयः <br><br> यस्तु भेददृष्टिविषयः सः— अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेदेति—अविद्याविषयः। <br><br> “एकधैवानुद्रष्टव्यम्” (बृ० उ० ४।४।२०) “मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति” (४।४।१९) इत्ये- | ‘आत्मा है’ इस प्रकार उपासना करे, उसकी खोज कर लेनेपर सभीकी खोज हो जाती है; तथा वह आत्मतत्त्व ही सबसे अधिक प्रिय होनेके कारण खोजनेयोग्य है। ‘उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ’ इस प्रकार [निर्दिष्ट होनेके कारण] एक आत्मतत्त्व ही ज्ञानका विषय है। जो भेददृष्टिका विषय है वह ‘यह अन्य है, मैं अन्य हूँ-इस प्रकार जो जानता है वह नहीं जानता’ ऐसा कहे जानेके कारण अविद्याका विषय है। <br><br> “आत्मतत्त्वको एक प्रकार ही देखना चाहिये” “जो यहाँ नानावत् देखता है वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त |