बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 409 of 1402
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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४०३
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| त्वं सामान्यमात्रबुद्ध्यगम्यत्वं च सप्रपञ्चं दर्शितम्। "आचार्यवान्पुरुषो वेद" (६।१४।२) "आचार्याद्धैव विद्या" (४।९।३) इति च्छान्दोग्ये। "उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः (४।३४) इति च गीतासु। इहापि च शाकल्ययाज्ञवल्क्यसंवादेन अतिगह्वरत्वं महता संरम्भेण ब्रह्मणो वक्ष्यति—तस्माच्छ्लिष्ट एव आख्यायिकारूपेण पूर्वपक्षसिद्धान्तरूपमापाद्य वस्तुसमर्पणार्थ आरम्भः। | सामान्यमात्र बुद्धिका अविषय है—यह विस्तारपूर्वक दिखलाया गया है। तथा "आचार्यवान् पुरुष जानता है" "आचार्यसे ही विद्या सफल होती है" इत्यादिरूपसे छान्दोग्योपनिषद्में और "तत्त्वदर्शी ज्ञानी लोग तुझे ज्ञानका उपदेश करेंगे" इस वाक्यसे गीतामें भी ऐसा ही कहा है। यहाँ (इस उपनिषद्में) भी शाकल्य और याज्ञवल्क्यके संवादद्वारा बड़े समारोहसे ब्रह्मतत्त्वकी अत्यन्त गहनताका प्रतिपादन किया जायगा; अतः आख्यायिकारूपसे पूर्वपक्ष और सिद्धान्तके स्वरूपका प्रतिपादन करके आत्मतत्त्वको समर्पण करनेके लिये आरम्भ करना उचित ही है। |
| आचारविध्युपदेशार्थश्च—एवमाचारवतोर्वक्तृश्रोत्रोराख्यायिकानुगतोऽर्थोऽवगम्यते। केवलतर्कबुद्धिनिषेधार्था चाख्यायिका—"नैषा तर्केण मतिरापनेया" (क० उ० १।२।९) "न तर्कशास्त्रदग्धाय" इति श्रुतिस्मृतिभ्याम्। श्रद्धा च ब्रह्मविज्ञाने परमं साधनमित्याख्या- | आचारकी विधिका उपदेश करनेके लिये भी [इस प्रकार आरम्भ करना उचित है]। इस प्रकारके आचारवाले वक्ता और श्रोता होनेपर ही इस आख्यायिकामें प्रतिपादित विषयका ज्ञान होता है। यह आख्यायिका केवल तर्कबुद्धिका निषेध करनेके लिये भी है, जैसा कि "यह बुद्धि तर्कसे प्राप्त होनेयोग्य नहीं है" जिसको बुद्धि तर्कशास्त्रसे दग्ध हो गयी है उसे [ ज्ञान नहीं होता ]" इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे सिद्ध होता है। तथा आख्यायिकाका यह भी अभिप्राय है कि ब्रह्मज्ञानमें श्रद्धा ही |