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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४३५


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
प्राणस्य विशिष्टैर्नामभिरामन्त्रणदर्शनाच्चेतनावत्त्वमभ्युपगतम् । चेतनावत्त्वे च पारार्थ्योपगमः समत्वादनुपपन्न इति चेत् ?<br><br>न; निरुपाधिकस्य केवलस्य विजिज्ञापयिषितत्वात् । क्रियाकारकफलात्मकता ह्यात्मनो नामरूपोपाधिजनिता अविद्याध्यारोपिता। तन्निमित्तो लोकस्य क्रियाकारकफलाभिमानलक्षणःसंसारः। स निरुपाधिकात्मस्वरूपविद्यया निवर्तयितव्य इति तत्स्वरूपविजिज्ञापयिषयोपनिषदारम्भः"ब्रह्म ते ब्रवाणि" (बृ० उ० २।१।१) "नैतावता विदितं भवति" (२।१।१४) इति चोपक्रम्य "एतावदरे खल्वमृतत्वम्" (४।५।१५) इति चोपसंहारात् । न चातोऽन्यदन्तराले विवक्षितमुक्तंप्राणका विशिष्ट नामोंद्वारा आमन्त्रण देखे जानेसे उसका चेतनावान् होना माना गया है। अतः चेतनावान् होनेपर भोक्ताके तुल्य ही होनेके कारण उसको परार्थ मानना उचित नहीं है—ऐसा कहें तो ?<br><br>सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि यहाँ केवल निरुपाधिक आत्माका ही ज्ञान कराना अभीष्ट है । आत्माकी क्रिया, कारक एवं फलरूपता तो नाम और रूपकी उपाधिके कारण अविद्यासे आरोपित है। उसीके कारण पुरुषको क्रिया, कारक एवं फलाभिमानरूप संसारकी प्राप्ति हुई है। उसे निरुपाधिक आत्मस्वरूपके ज्ञानसे निवृत्त करना है, इसलिये उसके स्वरूपका विज्ञान करानेकी इच्छासे ही इस उपनिषद्का आरम्भ हुआ है; क्योंकि "मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ", "इतनेसे ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता" इस प्रकार आरम्भ करके "अरे, निश्चय इतना ही अमृतत्व है" इस प्रकार उपसंहार किया गया है। बीचमें भी इससे भिन्न कोई और विवक्षित पदार्थ नहीं बतलाया गया।