बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 586 of 1402
Read in contextPage 586
| ५७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ | | :--- | :--- |
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| वास्ति; न चानात्मा सन्त्सर्वमात्मैव भवति कस्यचित्; तस्मादविद्ययैव अनात्मत्वं परिकल्पितम्; न तु परमार्थत आत्मव्यतिरेकेणास्ति किञ्चित् । तस्मात्परमार्थैकत्वप्रत्यये क्रियाकारकफलप्रत्ययानुपपत्तिः। अतो विरोधाद्ब्रह्मविदः क्रियाणां तत्साधनानां चात्यन्तमेव निवृत्तिः । केन कमिति क्षेपार्थं वचनं प्रकारान्तरानुपपत्तिदर्शनार्थम्, केनचिदपि प्रकारेण क्रियाकरणादिकारकानुपपत्तेः । केनचित् कश्चित् कञ्चित् कथञ्चिन्न जिघ्रेदेवेत्यर्थः । | किसीके लिये अनात्मा रहते हुए सब कुछ आत्मा हो ही सकता है; अतः अनात्मत्व तो अविद्यासे ही कल्पित है, वास्तवमें तो आत्मासे भिन्न कोई वस्तु है ही नहीं। अतः पारमार्थिक आत्मैकत्वका ज्ञान होनेपर क्रिया, कारक और फलकी प्रतीति होनी सम्भव नहीं है। इसलिये [ ज्ञानदृष्टिसे ] विरोध होनेके कारण ब्रह्मवेत्ताके लिये क्रिया और उनके साधनोंकी तो सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। 'केन कम्' ऐसा जो आक्षेपार्थक वचन है, वह प्रकारान्तरकी अनुपपत्ति प्रदर्शित करनेके लिये है; क्योंकि किसी भी प्रकारसे [ ब्रह्मवेत्ताके लिये ] क्रिया और करणादि कारकोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती। तात्पर्य यह है कि कोई भी किसीके द्वारा किसी प्रकार कुछ भी नहीं सूंघ सकता ! |
| यत्रापि अविद्यावस्थायामन्योऽन्यं पश्यति, तत्रापि येनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्येन विजानाति तस्य करणस्य विज्ञेये विनियुक्तत्वात्, ज्ञातुश्च ज्ञेय एव हि जिज्ञासा नात्मनि । न | इसके सिवा अविद्यावस्थामें भी जहाँ अन्य अन्यको देखता है, वहाँ भी जिसके द्वारा इस सबको जानता है, उसे किसके द्वारा जाने, क्योंकि जिसके द्वारा वह जानता है वह इन्द्रिय तो उसके विज्ञेयवर्गमें आ जाती है और ज्ञाताकी जिज्ञासा भी ज्ञेयमें ही होती है, अपनेमें नहीं |