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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

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Page 592

५८४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


| सर्वाणि च भूतान्यस्य कार्यम्; अतोऽस्य एककारणपूर्वकता। यस्मादेकस्मात्कारणादेतज्जातं तदेवैकं परमार्थतो ब्रह्म, इतरत्कार्यं वाचारम्भणं विकारो नामधेयमात्रमित्येष मधुपर्यायाणां सर्वेषामर्थः सङ्क्षेपतः। <br><br> अयमेव स योऽयं प्रतिज्ञातः "इदं सर्वं यदयमात्मा" (२। ४। ६) इति इदममृतम्; यन्मैत्रेय्या अमृतत्वसाधनमुक्तम्, आत्मविज्ञानमिदं तदमृतम्। इदं ब्रह्म, यत् 'ब्रह्म ते ब्रवाणि, ज्ञपयिष्यामि' इत्यध्यायादौ प्रकृतं यद्विषया च विद्या ब्रह्मविद्येत्युच्यते। इदं सर्वं यस्माद्ब्रह्मणो विज्ञानात्सर्वं भवति ॥ १ ॥ | हैं और समस्त भूत इन चारोंके कार्य हैं; अतः इस जगत्‌की एक कारणपूर्वकता है। जिस एक कारणसे यह उत्पन्न हुआ वही एक तत्त्व परमार्थतः ब्रह्म है, उससे भिन्न उसका कार्य वाणीसे आरम्भ होनेवाला विकार नाममात्र है-इस प्रकार मधुके पर्यायोंका यह संक्षेपतः अर्थ है। <br><br> यही वह है जिसके विषयमें यह प्रतिज्ञा की गयी है कि "यह जो कुछ है सब आत्मा है।" यह अमृत है। मैत्रेयीको जो अमृतत्वका साधन बतलाया गया था वह यह आत्म-विज्ञान अमृत है। यह ब्रह्म है, जिसका 'मैं तुझे ब्रह्मका उपदेश करूँगा; ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' इस प्रकार इस अध्यायके आरम्भमें प्रकरण है तथा जिससे सम्बन्ध रखनेवाली विद्या ब्रह्मविद्या इस नामसे कही जाती है। यह सर्व है, क्योंकि ब्रह्मका ज्ञान होनेसे सर्वरूप हो जाता है ॥ १ ॥ |


इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपा ँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो