बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
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Read in context| ५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| रित्ययुक्तम् आवरणधर्मवैलक्षण्यादिति चेत् ? | होनेके कारण उपलब्धि नहीं होती, क्योंकि आवरणके धर्मोंसे उनमें विलक्षणता है—यदि ऐसा कहें तो ? | | न, क्षीरोदकादेः क्षीराद्यावरणेनैकदेशत्वदर्शनात् । घटादिकार्ये कपालचूर्णाद्यवयवानामन्तर्भावादनावरणत्वमिति चेन्न, विभक्तानां कार्यान्तरत्वादावरणत्वोपपत्तेः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दूधमें मिले हुए जलादिकी अपने आवरण दुग्धादिके साथ एकदेशता देखी जाती है। यदि कहो कि घटादि कार्यमें उसके कपाल एवं चूर्णादि अवयवोंका अन्तर्भाव हो जाता है, इसलिये उनका आवरण है ही नहीं—तो यह ठीक नहीं, क्योंकि विभक्त होनेपर कार्यान्तर होनेके कारण उन्हें आवरण मानना ठीक ही है। | | आवरणाभाव एव यत्नः कर्तव्य इति चेत् ? पिण्डकपालावस्थयोर्विद्यमानमेव घटादिकार्यमावृतत्वान्नोपलभ्यत इति चेद् घटादिकार्यार्थिना तदावरणविनाश एव यत्नः कर्तव्यो न घटाद्युत्पत्तौ; न चैतदस्ति, तस्माद्युक्तं विद्यमानस्यैवावृतत्वादनुपलब्धिरिति चेत् ? | **पूर्व०—**तब तो आवरणकी निवृत्ति करनेका ही प्रयत्न करना चाहिये। यदि तुम्हारे कथनानुसार पिण्ड और कपालकी अवस्थाओंमें वर्तमान घटादि कार्य ही आवृत होनेके कारण उपलब्ध नहीं होता तब तो जिसे घटादि कार्यकी आवश्यकता हो उसे उसके आवरणका नाश करनेका ही यत्न करना चाहिये, घटादिकी उत्पत्तिका नहीं; किंतु ऐसा किया नहीं जाता, इसलिये यह कहना उचित नहीं है कि आवृत होनेके कारण विद्यमान घटादिकी ही उपलब्धि नहीं होती—ऐसा कहें तो ? |