बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 698 of 1402
Read in context| ६८८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| [ निष्कामानां नित्यकर्मणामात्मसंस्कारार्थत्वनिरूपणम् ]<br><br>तस्मात् साभिसन्धीनां नित्यानां कर्मणां सर्वमेधाश्वमेधादीनां च ब्रह्मत्वादीनि फलानि। | है। अतः ये ब्रह्मत्वादि फलाकाङ्क्षासहित नित्यकर्मोंके और सर्वमेध, अश्वमेधादि यज्ञोंके फल हैं। | | येषां पुनर्नित्यानि निरभिसन्धीन्यात्मसंस्कारार्थानि, तेषां ज्ञानोत्पत्त्यर्थानि तानि। "ब्राह्मीयं क्रियते तनुः" इति स्मरणात् तेषामारादुपकारकत्वान्मोक्षसाधनान्यपि कर्माणि भवन्तीति न विरुध्यते। यथा चायमर्थः षष्ठे जनकाख्यायिकासमाप्तौ वक्ष्यामः। | किंतु जिनके फलाशाशून्य नित्यकर्म चित्तशुद्धिके लिये होते हैं, उनके वे ज्ञानोत्पत्तिके कारण होते हैं, जैसा कि "यह शरीर ब्रह्मभावकी प्राप्तिके योग्य किया जाता है" इस स्मृतिसे प्रमाणित होता है। उन (मुमुक्षुओं) के समीपसे उपकारक होनेके कारण वे कर्म मोक्षके भी साधन होते हैं, इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। यह किस प्रकार मोक्षका साधन है, यह बात हम छठे [अर्थात् इस उपनिषद्के चौथे] अध्यायमें जनकाख्यायिकाकी समाप्तिमें कहेंगे। | | यत्तु विषदध्यादिवादित्युक्तम्, तत्र प्रत्यक्षानुमानविषयत्वादविरोधः। यस्तु अत्यन्तशब्दगम्योऽर्थः, तत्र वाक्यस्याभावे तदर्थप्रतिपादकस्य न शक्यं कल्पयितुं विषदध्यादिसाधर्म्यम्। | ऊपर जो विष और दधि आदिके समान—ऐसा कहा है, सो वे (मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदि) तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणके विषय हैं, इसलिये उनके विषयसे वैसा कहनेमें कोई विरोध नहीं है। परंतु जो विषय सर्वथा शब्दसे ही जाना जा सकता है, उसके विषयमें उस अर्थका प्रतिपादन करनेवाला कोई वाक्य न होनेके कारण उसका विष एवं दधि आदिसे साधर्म्य नहीं कल्पना किया जा सकता। |