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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 703 of 1402

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Page 703

ब्राह्मण ३ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ६९३


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
सीयते; न हि सत्त्वमात्रस्येदृशं विज्ञानमुपपद्यते ।जाता है; क्योंकि केवल किसी जीवमात्रका ऐसा ज्ञान होना सम्भव नहीं है।
तं सर्वे वयं परिवारिताः सन्तोऽपृच्छाम—कोऽसीति, कस्त्वमसि किन्नामा किंसत्त्वः । सोऽब्रवीद् गन्धर्वः—सुधन्वा नामतः, आङ्गिरसो गोत्रतः । तं यदा यस्मिन् काले लोकानामन्तान् पर्यवसानानि अपृच्छाम अथैनं गन्धर्वमब्रूम—भुवनकोशपरिमाणज्ञानाय प्रवृत्तेषु सर्वेष्वात्मानं श्लाघयन्तः पृष्टवन्तो वयम्; कथम् ? क्व पारिक्षिता अभवन्निति ।हम सबने उसे चारों ओरसे घेरकर पूछा, 'तुम कौन हो ? तुम्हारा क्या नाम है और क्या स्वरूप है?' उस गन्धर्वने कहा, 'नामसे मैं सुधन्वा हूँ और गोत्रसे आङ्गिरस हूँ।' फिर जब उससे लोकोंके अन्त यानी पर्यवसानके विषयमें पूछा तो हमने उस गन्धर्वसे कहा, अर्थात् भुवनकोशका परिमाण जाननेके लिये प्रवृत्त होनेपर हम सबने अपनी प्रशंसा करते हुए पूछा। किस प्रकार पूछा—'पारिक्षित कहाँ रहे ?'
स च गन्धर्वः सर्वमस्मभ्यमब्रवीत् । तेन दिव्येभ्यो मया लब्धं ज्ञानम्, तत्तव नास्ति, अतो निगृहीतोऽसि, इत्यभिप्रायः । सोऽहं विद्यासम्पन्नो लब्धागमो गन्धर्वात् त्वा त्वां पृच्छामि याज्ञवल्क्य—क्वपारिक्षिता अभवन्—तत् त्वं किं जानासि ? हे याज्ञवल्क्य 'कथय क्व पृच्छामि पारिक्षिता अभवन्निति ॥ १ ॥और उस गन्धर्वने हमें सब बातें बता दीं। अतः मैंने दिव्य जीवोंसे ज्ञान प्राप्त किया है, वह तुमको प्राप्त नहीं है; इसलिये अब तुम हरा दिये गये—ऐसा इसका अभिप्राय है। मैं विद्यासम्पन्न हूँ और मुझे गन्धर्वसे शास्त्रज्ञान प्राप्त हुआ है, वही मैं तुमसे पूछता हूँ कि हे याज्ञवल्क्य ! क्या तुम जानते हो कि पारिक्षित कहाँ रहे ? हे याज्ञवल्क्य ! बताओ, मैं पूछता हूँ कि पारिक्षित कहाँ रहे ? ॥ १ ॥