बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 723 of 1402
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ७१३
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
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| स्यैवानुवादः, तस्यैवानुक्तः कश्चिद् विशेषो वक्तव्य इति। कः पुनरसौ विशेषः ? इत्युच्यते पूर्वस्मिन् प्रश्नेऽस्ति व्यतिरिक्त आत्मा यस्यायं सप्रयोजको बन्ध उक्त इति। द्वितीये तु, तस्यैव आत्मनोऽशनायादिसंसारधर्मातीतत्वं विशेष उच्यते। यद्विशेषपरिज्ञानात् संन्याससहितात् पूर्वोक्ताद् बन्धनाद् विमुच्यते। तस्मात् प्रश्नप्रतिवचनयोः 'एष त आत्मा' इत्येवमन्तयोस्तुल्यार्थतैव। | क्योंकि उसीकी कुछ विशेषता बतलानी है, जो अभी बतायी नहीं गयी है। वह विशेषता क्या है ? सो बतलाया जाता है; पूर्व प्रश्नमें जिसका यह प्रयोजकोंसहित बन्ध बतलाया गया है, वह देहादिसे व्यतिरिक्त आत्मा है। दूसरे प्रश्नमें उसी आत्माका क्षुधादि संसारधर्मोंसे परे होना यह विशेषता बतलायी जाती है, जिस विशेषताका संन्यासपूर्वक ज्ञान होनेपर पुरुष पूर्वोक्त बन्धनसे मुक्त हो जाता है। अतः 'एष त आत्मा' इस वाक्यतक इन दोनों प्रश्न और उत्तरोंकी समानार्थता ही है। |
| ननु कथमेकस्यैवात्मन अशनायाद्यतीतत्वं तद्वत्त्वं चेति विरुद्धधर्मसमवायित्वमिति ? | **शङ्का—**किंतु एक ही आत्माका क्षुधादिसे अतीत और उनसे युक्त होना—यह विरुद्धधर्मसमवायित्व किस प्रकार सम्भव है ? |
| न; परिहृतत्वात्। नामरूप-<br>व्यवहारतद्भाव- विकारकार्यकरण-<br>समन्वयः लक्षणसङ्घातोपाधिभेदसम्पर्कजनितभ्रान्तिमात्रं हि संसारित्वम् इत्यसकृदवोचाम। विरुद्धश्रुतिव्याख्यानप्रसङ्गेन च; | **समाधान—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसका तो परिहार किया जा चुका है। उसका संसारित्व नाम-रूपात्मक विकाररूप जो देहेन्द्रियसंधात है, उस उपाधिभेदके सम्पर्कसे होनेवाली भ्रान्तिमात्र है—ऐसा हम अनेकों बार कह चुके हैं। तथा विरुद्धार्थवाची श्रुतियोंकी व्याख्याके प्रसङ्गमें भी यह बात कही जा |