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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 836 of 1402

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Page 836
८२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| अथ होवाच । अथानन्तरं तूष्णीम्भूतेषु ब्राह्मणेषु होवाच, हे ब्राह्मणा भगवन्त इत्येवं सम्बोध्य–यो वो युष्माकं मध्ये कामयते इच्छति--याज्ञवल्क्यं पृच्छामीति, स मा मामागत्य पृच्छतु; सर्वे वा मा पृच्छत—सर्वे वा यूयं मा मां पृच्छत । यो वः कामयते याज्ञवल्क्यो मां पृच्छत्विति, तं वः पृच्छामि; सर्वान् वा वो युष्मानहं पृच्छामि । ते ह ब्राह्मणा न दधृषुः-ते ब्राह्मणा एवमुक्ता अपि न प्रगल्भाः संवृत्ताः किञ्चिदपि प्रत्युत्तरं वक्तुम् ॥ २७ ॥ | 'अथ होवाच'—अथ—इसके अनन्तर ब्राह्मणोंके मौन हो जाने-पर याज्ञवल्क्यने 'हे पूज्य ब्राह्मण-गण !' इस प्रकार सम्बोधन करके कहा, 'आपमें जिसकी ऐसी कामना-इच्छा हो कि मैं याज्ञवल्क्यसे प्रश्न करूँ, वह मेरे सामने आकर पूछ सकता है । 'सर्वे वा मा पृच्छत'-अथवा आप सभी मुझसे पूछ सकते हैं। और आपमेंसे जिसकी ऐसी इच्छा हो कि याज्ञवल्क्य मुझसे प्रश्न करे, उससे मैं पूछता हूँ अथवा आप सभीसे मैं पूछता हूँ।' उन ब्राह्मणोंका साहस न हुआ-इस प्रकार कहे जानेपर भी वे ब्राह्मण किसी प्रकारका प्रत्युत्तर देनेकी प्रगल्भता (धृष्टता) न कर सके ॥ २७ ॥ |


याज्ञवल्क्यके प्रश्न

तान् हैतैः श्लोकैः पप्रच्छ—
यथा वृक्षो वनस्पतिस्तथैव पुरुषोऽमृषा ।
तस्य लोमानि पर्णानि त्वगस्योत्पाटिका बहिः ॥ १ ॥

याज्ञवल्क्यने उनसे इन श्लोकोंद्वारा प्रश्न किया—वनस्पति (विशा-लता आदि गुणोंसे युक्त) वृक्ष जैसा (जिस धर्मोंसे युक्त) होता है, पुरुष (जीवका शरीर) भी वैसा ही (उन्हीं धर्मोंसे सम्पन्न) होता है—यह बिल्कुल सत्य है । वृक्षके पत्ते होते हैं और उस पुरुषके शरीरमें पत्तोंकी जगह रोएँ होते हैं; उसके शरीरमें जो त्वचा (चाम) है, उसकी समतामें इस वृक्षके बाहरी भागमें छाल होती है ॥ १ ॥